Back to Languages

Hindi - Chapter 12 - Yusuf

Translation by Maulana Azizul Haque Al Umari — Permalink

Verse 1 — Surah Yusuf 12:1

अलिफ, लाम, रा। ये खुली पुस्तक की आयतें हैं।

Verse 2 — Surah Yusuf 12:2

हमने इस क़ुर्आन को अरबी में उतारा है, ताकि तुम समझो[1]।

Verse 3 — Surah Yusuf 12:3

(हे नबी!) हम बहुत अच्छी शैली में आपकी ओर इस क़ुर्आन की वह़्यी द्वारा आपसे इस कथा का वर्णन कर रहे हैं। अन्यथा आप (भी) इससे पूर्व (इससे) असूचित थे।

Verse 4 — Surah Yusuf 12:4

जब यूसुफ़ ने अपने पिता से कहाः हे मेरे पिता! मैंने स्वप्न देखा है कि ग्यारह सितारे, सूर्य तथा चाँद मुझे सज्दा कर रहे हैं।

Verse 5 — Surah Yusuf 12:5

उसने कहाः हे मेरे पुत्र! अपना स्वप्न अपने भाईयों को न बताना[1], अन्यथा वे तेरे विरुध्द षड्यंत्र रचेंगे। वास्तव में, शैतान मानव का खुला शत्रु है।

Verse 6 — Surah Yusuf 12:6

और ऐसा ही होगा, तेरा पालनहार तुझे चुन लेगा तथा तुझे बातों का अर्थ सिखायेगा और तुझपर और याक़ूब के घराने पर अपना पुरस्कार पूरा करेगा[1]। जैसे इससे पहले तेरे पूर्वजों इब्राहीम और इस्ह़ाक़ पर पूरा किया। वास्तव में, तेरा पालनहार बड़ा ज्ञानी तथा गुणी है।

Verse 7 — Surah Yusuf 12:7

वास्तव में, यूसुफ़ और उसके भाईयों (की कथा) में पूछने वालों के[1] लिए कई निशानियाँ हैं।

Verse 8 — Surah Yusuf 12:8

जब उन (भाईयों) ने कहाः यूसुफ़ और उसका भाई हमारे पिता को, हमसे अधिक प्रिय हैं। जबकि हम एक गिरोह हैं। वास्तव में, हमारे पिता खुली गुमराही में हैं।

Verse 9 — Surah Yusuf 12:9

यूसुफ़ को वध कर दो या उसे किसी धरती में फेंक दो। इससे तुम्हारे पिता का ध्यान केवल तुम्हारी तरफ हो जायेगा और इसके पश्चात् पवित्र बन जाओ।

Verse 10 — Surah Yusuf 12:10

उनमें से एक ने कहाः यूसुफ़ को वध न करो, उसे किसी अन्धे कुएँ में डाल दो, उसे कोई क़ाफ़िला निकाल ले जायेगा, यदि कुछ करने वाले हो।

Verse 11 — Surah Yusuf 12:11

उन्होंने कहाः हे हमारे पिता! क्या बात है कि यूसुफ़ के विषय में आप हमपर भरोसा नहीं करते? जबकि हम उसके शुभचिन्तक हैं।

Verse 12 — Surah Yusuf 12:12

उसे कल हमारे साथ वन में भेज दें। वह खाये-पिये और खेले-कूदे और हम उसके रक्षक (प्रहरी) हैं।

Verse 13 — Surah Yusuf 12:13

उस (पिता) ने कहाः मुझे बड़ी चिन्ता इस बात की है कि तुम उसे ले जाओ और मैं डरता हूँ कि उसे भेड़िया न खा जाये और तुम उससे असावधान रह जाओ।

Verse 14 — Surah Yusuf 12:14

सब (भाईयों) ने कहाः यदि उसे भेड़िया खा गया, जबकि हम एक गिरोह हैं, तो वास्तव में, हम बड़े विनाश में हैं।

Verse 15 — Surah Yusuf 12:15

फिर जब वे उसे ले गये और निश्चय किया कि उसे अंधे कुएं में डाल दें और हमने उस (यूसुफ़) की ओर वह़्यी की कि तुम अवश्य इन्हें इनका कर्म बताओगे और वे कुछ जानते न होंगे।

Verse 16 — Surah Yusuf 12:16

और वे संध्या को रोते हुए अपने पिता के पास आये।

Verse 17 — Surah Yusuf 12:17

सबने कहाः हे पिता! हम आपस में दौड़ करने लगे और यूसुफ को अपने सामान के पास छोड़ दिया और उसे भेड़िया खा गया और आप तो हमारा विश्वास करने वाले नहीं हैं, यद्यपि हम सच ही क्यों न बोल रहे हों।

Verse 18 — Surah Yusuf 12:18

और वे यूसुफ़ के कुर्ते पर झूठा रक्त[1] लगाकर लाये। उसने कहाः बल्कि तुम्हारे मन ने तुम्हारे लिए एक सुन्दर बात बना ली है! तो अब धैर्य धारण करना ही उत्तम है और उसके संबन्ध में जो बात तुम बना रहे हो, अल्ला ही से सहायता माँगनी है।

Verse 19 — Surah Yusuf 12:19

और एक क़ाफ़िला आया। उसने अपने पानी भरने वाले को भेजा, उसने अपना डोल डाला, तो पुकाराः शुभ हो! ये तो एक बालक है और उसे व्यपारिक सामग्री समझकर छुपा लिया और अल्लाह भली-भाँति जानने वाला था जो वे कर रहे थे।

Verse 20 — Surah Yusuf 12:20

और उसे तनिक मूल्य; कुछ गिनती के दिरहमों में बेच दिया और वे उसके बारे में कुछ अधिक की इच्छा नहीं रखते थे।

Verse 21 — Surah Yusuf 12:21

और मिस्र के जिस व्यक्ति ने उसे खरीदा, उसने अपनी पत्नी से कहाः इसे आदर-मान से रखो। संभव है ये हमें लाभ पहुँचाये, अथवा हम इसे अपना पुत्र बना लें। इस प्रकार उसे हमने स्थान दिया और ताकि उसे बातों का अर्थ सिखायें और अल्लाह अपना आदेश पूरा करके रहता है। परन्तु अधिक्तर लोग जानते नहीं हैं।

Verse 22 — Surah Yusuf 12:22

और जब वह जवानी को पहुँचा, तो हमने उसे निर्णय करने की शक्ति तथा ज्ञान प्रदान किया और इसी प्रकार हम सदाचारियों को प्रतिफल (बदला) देते हैं।

Verse 23 — Surah Yusuf 12:23

और वह जिस स्त्री[1] के घर में था, उसने उसके मन को रिझाया और द्वार बन्द कर लिए और बोलीः "आ जाओ"। उसने कहाः अल्लाह की शरण! वह मेरा स्वामी है। उसने मुझे अच्छा स्थान दिया है। वास्तव में, अत्याचारी सफल नहीं होते।

Verse 24 — Surah Yusuf 12:24

और उस स्त्री ने उसकी इच्छा की और वह (यूसुफ़) भी उसकी इच्छा करते, यदि अपने पालनहार का प्रमाण न देथ लेते[1]। इस प्रकार, हमने (उसे सावधान) किया ताकि उससे बुराई तथा निर्लज्जा को दूर कर दें। वास्तव में, वह हमारे शुध्द भक्तों में था।

Verse 25 — Surah Yusuf 12:25

और दोनों द्वार की ओर दौड़े और उस स्त्री ने उसका कुर्ता पीछे से फाड़ दिया और दोनों ने उसके पति को द्वार के पास पाया। उस (स्त्री) ने कहाः जिसने तेरी पत्नी के साथ बुराई का निश्चय किया, उसका दण्ड इसके सिवा क्या है कि उसे बंदी बना दिया जाये अथवा उसे दुःखदायी यातना (दी जाये)

Verse 26 — Surah Yusuf 12:26

उसने कहाः इसीने मुझे रिझाना चाहा था और उस स्त्री के घराने से एक साक्षी ने साक्ष्य दिया कि यदि उसका कुर्ता आगे से फाड़ा गया है, तो वह सच्ची है तथा वह झूठा है।

Verse 27 — Surah Yusuf 12:27

और यदि उसका कुर्ता पीछे से फाड़ा गया है, तो वह झूठी और वह (यूसुफ़) सच्चा है।

Verse 28 — Surah Yusuf 12:28

फिर जब उस (पति) ने देखा कि उसका कुर्ता पाछे से फाड़ा गया है, तो कहाः वास्तव में, ये तुम स्त्रियों की चालें हैं और तुम्हारी चालें बड़ी घोर होती हैं।

Verse 29 — Surah Yusuf 12:29

हे यूसुफ़! तुम इस बात को जाने दो और (हे स्त्री!) तू अपने पाप की क्षमा माँग, वास्तव में, तू पापियों में से है।

Verse 30 — Surah Yusuf 12:30

नगर की कुछ स्त्रियों ने कहाः अज़ीज़ (प्रमुख अधिकारी) की पत्नी, अपने दास को रिझा रही है! उसे प्रेम ने मुग्ध कर दिया है। हमारे विचार में वह खुली गुमराही में है।

Verse 31 — Surah Yusuf 12:31

फिर जब उसने उन स्त्रियों की मक्कारी की बात सुनी, तो उन्हें बुला भेजा और उनके (आतिथ्य) के लिए गाव-तकिये लगवाये और प्रत्येक स्त्री को एक छुरी दे दी[1]। उसने (यूसुफ़ से) कहाः इनके समक्ष "निकल आ"। फिर जब उन स्त्रियों ने उसे देखा, तो चकित (दंग) होकर अपने हाथ काट बैठीं तथा पुकार उठीं: अल्लाह पवित्र है! ये मनुष्य नहीं ये तो कोई सम्मानित फ़रिश्ता है।

Verse 32 — Surah Yusuf 12:32

उसने कहाः यही वह है, जिसके बारे में तुमने मेरी निंदा की है। वास्तव में, मैंने ही उसे रिझाया था। मगर वह बच निकला और यदि, वह मेरी बात न मानेगा, तो अवश्य बंदी बना दिया जायेगा और अपमानितों में हो जायेगा।

Verse 33 — Surah Yusuf 12:33

यूसुफ़ ने प्रार्थना कीः हे मेरे पालनहार! मुझे क़ैद उससे अधिक प्रिय है, जिसकी ओर ये औरतें मुझे बुला रही हैं और यदि तूने मुझसे इनके छल को दूर नहीं किया, तो मैं इनकी ओर झुक पड़ूँगा और अज्ञानों में से हो जाऊँगा।

Verse 34 — Surah Yusuf 12:34

तो उसके पालनहार ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और उससे उनके छल को दूर कर दिया। वास्तव में, वह बड़ा सुनने-जानने वाला है।

Verse 35 — Surah Yusuf 12:35

फिर उन लोगों[1] ने उचित समझा, इसके पश्चात् कि निशानियाँ देख[2] लीं कि उस (यूसुफ़) को एक अवधि तक के लिए बंदी बना दें।

Verse 36 — Surah Yusuf 12:36

और उसके साथ क़ैद में दो युवकों ने प्रवेश किया। उनमें से एक ने कहाः मैंने स्वप्न देखा है कि शराब निचोड़ रहा हूँ और दूसरे ने कहाः मैंने स्वप्न देखा है कि अपने सिर के ऊपर रोटी उठाये हुए हूँ, जिसमें से पक्षी खा रहे हैं। हमें इसका अर्थ (स्वप्नफल) बता दो। हम देख रहे हैं कि तुम सदाचारियों में से हो।

Verse 37 — Surah Yusuf 12:37

यूसुफ़ ने कहाः तुम्हारे पास तुम्हारा वह भोजन नहीं आयेगा, जो तुम दोनों को दिया जाता है, परन्तु मैं तुम दोनों को उसका अर्थ (फल) बता दूँगा; ये उन बातों में से है, जो मेरे पालनहार ने मुझे सिखायी हैं। मैंने उस जाति का धर्म तज दिया है, जो अल्लाह पर ईमान नहीं रखती और वही परलोक को नकारने वाले हैं।

Verse 38 — Surah Yusuf 12:38

और अपने पूर्वजों; इब्राहीम, इस्ह़ाक़ और याक़ूब के धर्म का अनुसरण किया है। हमारे लिए वैध नहीं कि किसी चीज़ को अल्लाह का साझी बनायें। ये अल्लाह की दया है, हमपर और लोगों पर। परन्तु अधिक्तर लोग कृतज्ञ नहीं होते[1]।

Verse 39 — Surah Yusuf 12:39

हे मेरे क़ैद के दोनों साथियो! क्या विभिन्न पूज्य उत्तम हैं या एक प्रभुत्वशाली अल्लाह

Verse 40 — Surah Yusuf 12:40

तुम अल्लाह के सिवा जिसकी इबादत (वंदना) करते हो, वे केवल नाम हैं, जो तुमने और तुम्हारे बाप-दादा ने रख लिए हैं। अल्लाह ने उनका कोई प्रमाण नहीं उतारा है। शासन तो केवल अल्लाह का है। उसने आदेश दिया है कि उसके सिवा किसी की इबादत (वंदना) न करो। यही सीधा धर्म है। परन्तु अधिक्तर लोग नहीं जानते हैं।

Verse 41 — Surah Yusuf 12:41

हे मेरे क़ैद के दोनों साथियो! रहा तुममें से एक, तो वह अपने स्वामि को शराब पिलायेगा तथा दूसरा, तो उसको फाँसी दी जायेगी और पक्षी उसके सिर में से खायेंगे। उसका निर्णय कर दिया गया है, जिसके संबन्ध में तुम दोनों प्रश्न कर रहे थे।

Verse 42 — Surah Yusuf 12:42

और उससे कहा, जिसे समझा कि वह उन दोनों में से मुक्त होने वाला हैः मेरी चर्चा अपने स्वामी के पास कर देना। तो शैतान ने उसे अपने स्वामी के पास, उसकी चर्चा करने को भुला दिया। अतः वह (यूसुफ़) कई वर्ष क़ैद में रह गया।

Verse 43 — Surah Yusuf 12:43

और (एक दिन) राजा ने कहाः मैं सात मोटी गायों को सपने में देखता हूँ, जिनको सात दुबली गायें खा रही हैं और सात हरी बालियाँ हैं और दूसरी सात सूखी हैं। हे प्रमुखो! मुझे मेरे स्वप्न के सम्बंध में बताओ, यदि तुम स्वप्न-फल बता सकते हो

Verse 44 — Surah Yusuf 12:44

सबने कहाः ये तो उलझे स्वप्न की बातें हैं और हम ऐसे स्वप्नों का अर्थ (फल) नहीं जानते।

Verse 45 — Surah Yusuf 12:45

और उसने कहा, जो दोनों में से मुक्त हुआ था और उसे एक अवधि के पश्चात्, बात याद आयी थीः मैं तुम्हें इसका फल (अर्थ) बता दूँगा, तुम मुझे भेज[1] दो।

Verse 46 — Surah Yusuf 12:46

हे यूसुफ़! हे सत्यवादी! हमें सात मोटी गायों के बारे में बताओ, जिन्हें सात दुबली गायें खा रही हैं और सात हरी बालियाँ हैं और सात सूखी, ताकि लोगों के पास वापस जाऊँ और ताकि वे जान[1] लें।

Verse 47 — Surah Yusuf 12:47

यूसुफ़ ने कहाः तुम सात वर्ष निरन्तर खेती करते रहोगे। तो जो कुछ काटो, उसे उसकी बाली में छोड़ दो, परन्तु थोड़ा जिसे खाओगे। ( उसे बालियों से निकाल लो।)

Verse 48 — Surah Yusuf 12:48

फिर इसके पश्चात् सात कड़े अकाल के वर्ष होंगे, जो उसे खा जायेंगे, जो तुमने उनके लिए पहले से रखा है, परन्तु उसमें से थोड़ा, जिसे तुम सुरक्षित रखोगे।

Verse 49 — Surah Yusuf 12:49

फिर इसके पश्चात् एक ऐसा वर्ष आयेगा, जिसमें लोगों पर जल बरसाया जायेगा तथा उसीमें वे (रस) निचोड़ेंगे।

Verse 50 — Surah Yusuf 12:50

और राजा ने कहाः उसे मेरे पास लाओ और जब यूसुफ़ के पास भेजा हुआ आया, तो आपने उससे कहा कि अपने स्वामी के पास वापस जाओ[1] और उससे पूछो कि उन स्त्रियों की क्या दशा है, जिन्होंने अपने हाथ काट लिए थे? वास्तव में, मेरा पालनहार उन स्त्रियों के छल से भली-भाँति अवगत है।

Verse 51 — Surah Yusuf 12:51

(राजा) ने उन स्त्रियों से पूछाः तुम्हारा क्या अनुभव है, उस समय का, जब तुमने यूसुफ़ के मन को रिझाया था? सबने कहाः अल्लाह पवित्र है! उसपर हमने कोई बुराई का प्रभाव नहीं जाना। तब अज़ीज़ की पत्नी बोल उठीः अब सत्य उजागर हो गया, वास्तव में, मैंने ही उसके मन को रिझाया था और निःसंदेह वह सत्यवादियों में है[1]।

Verse 52 — Surah Yusuf 12:52

ये (यूसुफ़ ने) इसलिए किया, ताकि उसे (अज़ीज़ को) विश्वास हो जाये, कि मैंने गुप्त रूप से उसके साथ विश्वास घात नहीं किया और वस्तुतः, अल्लाह विश्वासघातियों से प्रेम नहीं करता।

Verse 53 — Surah Yusuf 12:53

और मैं अपने मन को निर्दोश नहीं कहता, मन तो बुराई पर उभारता है; परन्तु जिसपर मेरा पालनहार दया कर दे। मेरा पालनहार अति क्षमाशील तथा दयावान् है।

Verse 54 — Surah Yusuf 12:54

राजा ने कहाः उसे मेरे पास लाओ, उसे मैं अपने लिए विशेष कर लूँ और जब (राजा ने) उस (यूसुफ़) से बात की, तो कहाः वस्तुतः तू आज हमारे पास आदर्णीय भरोसा, करने योग्य है।

Verse 55 — Surah Yusuf 12:55

उस (यूसुफ़) ने कहाः मुझे देश का कोषाधिकारी बना दीजिये। वास्तव में मैं, रखवाला, बड़ा ज्ञानी हूँ।

Verse 56 — Surah Yusuf 12:56

और इस प्रकार, हमने यूसुफ को उस धरती (देश) में अधिकार दिया, वह उसमें जहाँ चाहे, रहे। हम अपनी दया जिसे चाहें, प्रदान करते हैं और सदाचारियों का प्रतिफल व्यर्थ नहीं करते।

Verse 57 — Surah Yusuf 12:57

और निश्चय परलोक का प्रतिफल उन लोगों के लिए उत्तम है, जो ईमान लाये और अल्लाह से डरते रहे।

Verse 58 — Surah Yusuf 12:58

और यूसुफ़ के भाई आये[1] तथा उसके पास उपस्थित हुए और उसने उन्हें पहचान लिया तथा वे उससे अपरिचित रह गये।

Verse 59 — Surah Yusuf 12:59

और जब उनका सामान तैयार कर दिया, तो कहाः अपने सौतीले भाई[1] को लाना। क्या तुम नहीं देखते कि मैं पूरा माप देता हूँ तथा उत्तम अतिथि-सत्कार करने वाला हूँ

Verse 60 — Surah Yusuf 12:60

फिर यदि, तुम उसे मेरे पास नहीं लाये, तो मेरे यहाँ तुम्हारे लिए कोई माप नहीं और न तुम मेरे समीप होगे।

Verse 61 — Surah Yusuf 12:61

वे बोलेः हम उसके पिता को इसकी प्रेरणा देंगे और हम अवश्य ऐसा करने वाले हैं।

Verse 62 — Surah Yusuf 12:62

और यूसुफ़ ने अपने सेवकों को आदेश दियाः उनका मूलधन[1] उनकी बोरियों में रख दो, संभवतः वे उसे पहचान लें, जब अपने परिजनों में जायें और संभवतः वापस आयें।

Verse 63 — Surah Yusuf 12:63

फिर जब अपने पिता के पास लौटकर गये, तो कहाः हमारे पिता! हम से भविष्य में (अन्न) रोक दिया गया है। अतः हमारे साथ हमारे भाई को भेजें कि हम सब अन्न (ग़ल्ला) लायें और (विशवास कीजीए कि) हम उसके रक्षक हैं।

Verse 64 — Surah Yusuf 12:64

उस (पिता) ने कहाः क्या मैं उसके लिए तुमपर वैसे ही विश्वास कर लूँ, जैसे इसके पहले उसके भाई (यूसुफ़) के बारे में विश्वास कर चुका हूँ? तो अल्लाह ही उत्तम रक्षक और वही सर्वाधिक दयावान् है।

Verse 65 — Surah Yusuf 12:65

और जब उन्होंने अपना सामान खोला, तो पाया कि उनका मूलधन उन्हें फेर दिया गया है, उन्होंने कहाः हे हमारे पिता! हमें और क्या चाहिए? ये हमारा धन, हमें फेर दिया गया है? हम अपने घराने के लिए ग़ल्ले (अन्न) लायेंगे और एक ऊँट का बोझ अधिक लायेंगे[1], ये माप (अन्न) बहुत थोड़ा है।

Verse 66 — Surah Yusuf 12:66

उस (पिता) ने कहाः मैं कदापि उसे तुम्हारे साथ नहीं भेजूँगा, यहाँ तक कि अल्लाह के नाम पर मुझे दृढ़ वचन दो कि उसे मेरे पास अवश्य लाओगे, परन्तु ये कि तुमको घेर लिया[1] जाये और जब उन्होंने अपना दृढ़ वचन दिया, तो कहा, अल्लाह ही तुम्हारी बात (वचन) का निरीक्षक है।

Verse 67 — Surah Yusuf 12:67

और ( जब वे जाने लगे) तो उस (पिता) ने कहाः हे मेरे पुत्रो! तुम एक द्वार से मिस्र में प्रवेश न करना, बल्कि विभिन्न द्वारों से प्रवेश करना और मैं तुम्हें किसी चीज़ से नहीं बचा सकता, जो अल्लाह की ओर से हो और आदेश तो अल्लाह का चलता है, मैंने उसीपर भरोसा किया तथा उसीपर भरोसा करने वालों को भरोसा करना चाहिए।

Verse 68 — Surah Yusuf 12:68

और जब उन्होंने (मिस्र में) प्रवेश किया, जैसे उनके पिता ने आदेश दिया था, तो ऐसा नहीं हुआ कि वह उन्हें अल्लाह से कुछ बचा सके; परन्तु ये याक़ूब के दिल में एक विचार उत्पन्न हुआ, जिसे उसने पूरा कर लिया[1] और वास्तव में, वह उसका ज्ञानी था, जो ज्ञान हमने उसे दिया था। परन्तु अधिकांश लोग इस (की वास्तविक्ता) का ज्ञान नहीं रखते।

Verse 69 — Surah Yusuf 12:69

और जब वे यूसुफ़ के पास पहुँचे, तो उसने अपने भाई को अपनी शरण में ले लिया (और उससे) कहाः मैं तेरा भाई (यूसुफ़) हूँ। अतः उससे उदासीन न हो, जो (दुरव्यवहार) वे करते आ रहे हैं।

Verse 70 — Surah Yusuf 12:70

फिर जब उस (यूसुफ़) ने उनका सामान तैयार करा दिया, तो प्याला अपने भाई के सामान में रख दिया। फिर एक पुकारने वाले ने पुकाराः हे क़ाफ़िले वालो! तुम लोग तो चोर हो

Verse 71 — Surah Yusuf 12:71

उन्होंने फिरकर कहाः तुम क्या खो रहे हो

Verse 72 — Surah Yusuf 12:72

उन (कर्मचारियों) ने कहाः हमें राजा का प्याला नहीं मिल रहा है और जो उसे ले आये, उसके लिए एक ऊँट का बोझ है और मैं उसका प्रतिभु[1] हूँ।

Verse 73 — Surah Yusuf 12:73

उन्होंने कहाः तुम जानते हो कि हम इस देश में उपद्रव करने नहीं आये हैं और न हम चोर ही हैं।

Verse 74 — Surah Yusuf 12:74

उन लोगों ने कहाः तो यदि तुम झूठे निकले, तो उसका दण्ड क्या होगा

Verse 75 — Surah Yusuf 12:75

उन्होंने कहाः उसका दण्ड! जिसके सामान में (प्याला) पाया जाये, वही उसका दण्ड होगा। इसी प्रकार, हम अत्याचारियों को दण्ड देते हैं[1]।

Verse 76 — Surah Yusuf 12:76

फिर उसने खोज का आरंभ उस (यूसुफ़) के भाई की बोरी से पहले, उनकी बोरियों से किया। फिर उसे उस (बिनयामीन) की बोरी से निकाल लिया। इस प्रकार, हमने यूसुफ़ के लिए उपाय किया। वह राजा के नियमानुसार अपने भाई को नहीं रख सकता था, परन्तु ये कि अल्लाह चाहता। हम जिसका चाहें मान सम्मान ऊँचा कर देते हैं और प्रत्येक ज्ञानी से ऊपर एक बड़ा ज्ञानी[1] है।

Verse 77 — Surah Yusuf 12:77

उन भाईयों ने कहाः यदि उसने चोरी की है, तो उसका एक भाई भी इससे पहले चोरी कर चुका है। तो यूसुफ़ ने ये बात अपने दिल में छुपा ली और उसे उनके लिए प्रकट नहीं किया। (यूसुफ़ ने) कहाः सबसे बुरा स्थान तुम्हारा है और अल्लाह उसे अधिक जानता है, जो तुम कह रहे हो।

Verse 78 — Surah Yusuf 12:78

उन्होंने कहाः हे अज़ीज़[1]! उसका पिता बहुत बूढ़ा है। अतः हम में से किसी एक को उसके स्थान पर ले लो। वास्तव में, हम आपको परोपकारी देख रहे हैं।

Verse 79 — Surah Yusuf 12:79

उस (यूसुफ) ने कहाः अल्लाह की शरण कि हम (किसी अन्य को) पकड़ लें, उसके सिवा जिसके पास अपना सामान पाया है। (यदि ऐसा न करें) तो हम वास्तव में अत्याचारी होंगे।

Verse 80 — Surah Yusuf 12:80

फिर जब उससे निराश हो गये, तो एकान्त में होकर प्रामर्श करने लगे। उनके बड़े ने कहाः क्या तुम नहीं जानते कि तुम्हारे पिता ने तुमसे अल्लाह को साक्षी बनाकर दृढ़ वचन लिया था? और इससे पहले जो अपराध तुमने यूसुफ के बारे में किया है? तो मैं इस धरती (मिस्र) से नहीं जाऊँगा, जब तक मुझे मेरे पिता अनुमति न दे दें अथवा अल्लाह मेरे लिए निर्णय न कर दे और वही सबसे अच्छा निर्णय करने वाला है।

Verse 81 — Surah Yusuf 12:81

तुम अपने पिता की ओर लौट जाओ और कहो कि हमारे पिता! आपके पुत्र ने चोरी की है और हमने वही साक्ष्य दिया, जिसे हमने[1] जाना और हम ग़ैब के रखवाले नहीं[2] थे।

Verse 82 — Surah Yusuf 12:82

आप उस बस्ती वालों से पूछ लें, जिसमें हम थे और उस क़ाफ़िले से जिसमें हम आये हैं और वास्तव में हम सच्चे हैं।

Verse 83 — Surah Yusuf 12:83

उस (पिता) ने कहाः ऐसा नहीं है, बल्कि तुम्हारे दिलों ने एक बात बना ली है। इसलिए अब सहन करना ही उत्तम है, संभव है कि अल्लाह उनसब को मेरे पास वापस ले आए, वास्तव में, वही जानने वाला, तत्वदर्शी है।

Verse 84 — Surah Yusuf 12:84

और उनसे मुँह फेर लिया और कहाः हाय यूसुफ़! और उसकी दोनों आँखें शोक के कारण (रोते-रोते) सफेद हो गयीं और उसका दिल शोक से भर गया।

Verse 85 — Surah Yusuf 12:85

उन (पुत्रों) ने कहाः अल्लाह की शपथ! आप बराबर यूसुफ़ को याद करते रहेंगे, यहाँ तक कि (शोक से) घुल जायें या अपना विनाश कर लें।

Verse 86 — Surah Yusuf 12:86

उसने कहाः मैं अपनी आपदा तथा शोक की शिकायत अल्लाह के सिवा किसी से नहीं करता और अल्लाह की ओर से वह बात जानता हूँ, जो तुम नहीं जानते।

Verse 87 — Surah Yusuf 12:87

हे मेरे पुत्र! जाओ और यूसुफ़ और उसके भाई का पता लगाओ और अल्लाह की दया से निराश न हो। वास्तव में, अल्लाह की दया से वही निराश होते हैं, जो काफ़िर हैं।

Verse 88 — Surah Yusuf 12:88

फिर जब (यूसुफ़ के भाई) उसके पास (मिस्र) गये, तो कहाः हे अज़ीज़! हमपर और गमारे घराने पर आपदा (अकाल) आ पड़ी है और हम थोड़ा धन (मूल्य) लाये हैं, अतः हमें (अन्न का) पूरा माप दें और हम पर दान करें। वास्तव में, अल्लाह दानशीलों को प्रतिफल प्रदान करता है।

Verse 89 — Surah Yusuf 12:89

उस (यूसुफ़) ने कहाः क्या तुम जानते हो कि तुमने यूसुफ़ तथा उसके भाई के साथ क्या कुछ किया है, जब तुम अज्ञान थे

Verse 90 — Surah Yusuf 12:90

उन्होंने कहाः क्या आप यूसुफ़ हैं? यूसुफ़ ने कहाः मैं यूसुफ़ हूँ और ये मेरा भाई है। अल्लाह ने हमपर उपकार किया है। वास्तव में, जो (अल्लाह से) डरता तथा सहन करता है, तो अल्लाह सदाचारियों का प्रतिफल व्यर्थ नहीं करता।

Verse 91 — Surah Yusuf 12:91

उन्होंने कहाः अल्लाह की शपथ! उसने आपको हमपर श्रेष्ठता प्रदान की है। वास्तव में, हम दोषी थे।

Verse 92 — Surah Yusuf 12:92

यूसुफ़ ने कहाः आज तुमपर कोई दोष नहीं, अल्लाह तुम्हें क्षमा कर दे! वही सर्वाधिक दयावान् है।

Verse 93 — Surah Yusuf 12:93

मेरा ये कुर्ता ले जाओ और मेरे पिता के मुँह पर डाल दो, वह देखने लगेंगे। और अपने पूरे घराने को (मिस्र) ले आओ।

Verse 94 — Surah Yusuf 12:94

और जब क़ाफ़िले ने परस्थान किया, तो उनके पिता ने कहाः मुझे यूसुफ़ की सुगन्ध आ रही है, यदि तुम मुझे बहका हुआ बूढ़ा न समझो।

Verse 95 — Surah Yusuf 12:95

उन लोगों[1] ने कहाः अल्लाह की शपथ! आप तो अपनी पुरानी सनक में पड़े हुए हैं।

Verse 96 — Surah Yusuf 12:96

फिर जब शुभ-सूचक आ गया, तो उसने वह कुर्ता उनके मुख पर डाल दिया और वे तुरन्त देखने लगे। याक़ूब ने कहाः क्या मैंने तुमसे नहीं कहा था कि वास्तव में अल्लाह की ओर से जो कुछ मैं जानता हूँ, तुम नहीं जानते

Verse 97 — Surah Yusuf 12:97

सब (भाईयों) ने कहाः हे हमारे पिता! हमारे लिए हमारे पापों की क्षमा माँगिए, वास्तव में, हम ही दोषी थे।

Verse 98 — Surah Yusuf 12:98

याक़ूब ने कहाः मैं तुम्हारे लिए अपने पालनहार से क्षमा की प्रार्थना करूँगा, वास्तव में, वह अति क्षमी, दयावान् है।

Verse 99 — Surah Yusuf 12:99

फिर जब वे यूसुफ़ के पास पहुँचे, तो उसने अपनी माता-पिता को अपनी शरण में ले लिया और कहाः नगर (मिस्र) में प्रवेश कर जाओ, यदि अल्लाह ने चाहा, तो शान्ति से रहोगे।

Verse 100 — Surah Yusuf 12:100

तथा अपने माता-पिता को उठाकर सिंहासन पर बिठा लिया और सब उसके समक्ष सज्दे में गिर गये और यूसुफ़ ने कहाः हे मेरे पिता! यही मेरे स्वप्न का अर्थ है, जो मैंने पहले देखा था। मेरे पालनहार ने उसे सच कर दिया है तथा मेरे साथ उपकार किया, जब उसने मुझे कारावास से निकाला और आप लोगों को गाँव से मेरे पास (नगर में) ले आया, इसके पश्चात् कि शैतान ने मेरे तथा मेरे भाईयों के बीच विरोध डाल दिया। वास्तव में, मेरा पालनहार जिसके लिए चाहे, उसके लिए उत्तम उपाय करने वाहा है। निश्चय वही अति ज्ञानी, तत्वज्ञ है।

Verse 101 — Surah Yusuf 12:101

हे मेरे पालनहार! तूने मुझे राज प्रदान किया तथा मुझे स्वप्नों का अर्थ सिखाया। हे आकाशों तथा धरती के उत्पत्तिकार! तू लोक तथा परलोक में मेरा रक्षक है। तू मेरा अन्त इस्लाम पर कर और मुझे सदाचारियों में मिला दे।

Verse 102 — Surah Yusuf 12:102

(हे नबी!) ये (कथा) परोक्ष के समाचारों में से है, जिसकी वह़्यी हम आपकी ओर कर रहे हैं। और आप उन (भाईयों) के पास नहीं थे, जब वे आपस की सहमति से षड्यंत्र रचते रहे।

Verse 103 — Surah Yusuf 12:103

और अधिकांश लोग आप कितनी ही लालसा करें, ईमान लाने वाले नहीं हैं।

Verse 104 — Surah Yusuf 12:104

और आप इस (धर्मप्रचार) पर उनसे कोई पारिश्रमिक (बदला) नहीं माँगते। ये (क़ुर्आन) तो विश्ववासियों के लिए (केवल) एक शिक्षा है।

Verse 105 — Surah Yusuf 12:105

तथा आकाशों और धरती में बहुत सी निशानियाँ (लक्षण[1]) हैं, जिनपर से लोग गुज़रते रहते हैं और उनपर ध्यान नहीं देते[2]।

Verse 106 — Surah Yusuf 12:106

और उनमें से अधिक्तर अल्लाह को मानते तो हैं, परन्तु (साथ ही) मुश्रिक (मिश्रणवादी)[1] भी हैं।

Verse 107 — Surah Yusuf 12:107

तो क्या वे निर्भय हो गये हैं कि उनपर अल्लाह की यातना छा जाये अथवा उनपर प्रलय अकस्मात आ जाये और वे अचेत रह जायेँ

Verse 108 — Surah Yusuf 12:108

(हे नबी!) आप कह दें: यही मेरी डगर है, मैं अल्लाह की ओर बुला रहा हूँ। मैं पूरे विश्वास और सत्य पर हूँ और जिसने मेरा अनुसरण किया (वे भी) तथा अल्लाह पवित्र है और मैं मुश्रिकों (मिश्रणवादियों) में से नहीं हूँ।

Verse 109 — Surah Yusuf 12:109

और हमने आपसे पहले मानव[1] पुरुषों ही को नबी बनाकर भेजा, जिनकी ओर प्रकाशना भेजते रहे, नगर वासियों में से, क्या वे धरती में चले फिरे नहीं, ताकि देखते कि उनका परिणाम क्या हुआ, जो इनसे पहले थे? और निश्चय आख़िरत (परलोक) का घर (स्वर्ग) उनके लिए उत्तम है, जो अल्लाह से डरे, तो क्या तुम समझते नहीं हो

Verse 110 — Surah Yusuf 12:110

(इससे पहले भी रसूलों के साथ यही हुआ।) यहाँ तक कि जब रसूल निराश हो गये और लोगों को विश्वास हो गया कि उनसे झूठ बोला गया है, तो उनके लिए हमारी सहायता आ गई, फिर हम जिसे चाहते हैं, बचा लेते हैं और हमारी यातना अपराधियों से फेरी नहीं जाती।

Verse 111 — Surah Yusuf 12:111

इन कथाओं में, बुध्दिमानों के लिए बड़ी शिक्षा है, ये (क़ुर्आन) ऐसी बातों का संग्रह नहीं है, जिसे स्वयं बना लिया जाता हो, परन्तु इससे पहले की पुस्तकों की सिध्दि और प्रत्येक वस्तु का विवरण (ब्योरा) है तथा मार्गदर्शन और दया है, उन लोगों के लिए जो ईमान (विश्वास) रखते हों।