वही है, जिसने अह्ले किताब में से काफ़िरों को उनके घरों से पहले ही आक्रमण में निकाल दिया। तुमने नहीं समझा था कि वे निकल जायेंगे और उन्होंने समझा था कि रक्षक होंगे उनके दुर्ग[1] अल्लाह से। तो आ गया उनके पास अल्लाह (का निर्णय)। ऐसा उन्होंने सोचा भी न था तथा डाल दिया उनके दिलों में भय। वे उजाड़ रहे थे अपने घरों को अपने हाथों से तथा ईमान वालों के हाथों[2] से। तो शिक्षा लो, हे आँख वालो
(हे मुसलमानो!) तुमने नहीं काटा[1] कोई खजूर का वृक्ष और न छोड़ा उसे खड़ा अपने तने पर, परन्तु ये सब अल्लाह के आदेश से हुआ और ताकि वह अपमानित करे पथभ्रष्टों को।
और जो धन दिला दिया अल्लाह ने अपने रसूल को उनसे, तो नहीं दौड़ाये तुमने उसके लिए घोड़े और न ऊँट। परन्तु अल्लाह प्रभुत्व प्रदान कर देता है अपने रसूल को, जिसपर चाहता है तथा अल्लाह जो चाहे, कर सकता है।
अल्लाह ने जो धन दिलाया है अपने रसूल को इस बस्ती वालों[1] से, वह अल्लाह, रसूल, (आपके) समीपवर्तियों, अनाथों, निर्धनों तथा यात्रियों के लिए है; ताकि वह (धन) फिरता न रह[2] जाये तुम्हारे धनवानों के बीच और जो प्रदान कर दे रसूल, तुम उसे ले लो और रोक दें तुम्हें जिससे, तुम उससे रुक जाओ तथा अल्लाह से डरते रहो, निश्चय अल्लाह कड़ी यातना देने वाला है।
उन निर्धन मुहाजिरों के लिए है, जो निकाल दिये गये अपने घरों तथा धनों से। वे चाहते हैं अल्लाह का अनुग्रह तथा प्रसन्नता और सहायता करते हैं अल्लाह तथा उसके रसूल की, यही सच्चे हैं।
तथा उन लोगों[1] के लिए (भी), जिन्होंने आवास बना लिया इस घर (मदीना) को तथा उन (मुहाजिरों के आने) से पहले ईमान लाये, वे प्रेम करते हैं उनसे, जो हिजरत करके आ गये उनके यहाँ और वे नहीं पाते अपने दिलों में कोई आवश्यक्ता उसकी, जो उन्हें दिया जाये और प्राथमिक्ता देते हैं दूसरों को अपने ऊपर, चाहे स्वयं भूखे[1] हों और जो बचा लिये गये अपने मन की तंगी से, तो वही सफल होने वाले हैं।
और जो आये उनके पश्चात्, वे कहते हैं: हे हमारे पालनहार! हमें क्षमा कर दे तथा हमारे उन भाईयों को, जो हमसे पहले ईमान लाये और न रख हमारे दिलों में कोई बैर उनके लिए, जो ईमान लाये। हे हमारे पालनहार! तू अति करुणामय, दयावान् है।
क्या आपने उन्हें[1] नहीं देखा, जो मुनाफ़िक़ (अवसरवादी) हो गये और कहते हैं अपने अह्ले किताब भाईयों से कि यदि तुम्हें देश निकाला दिया गया, तो हम अवश्य निकल जायेंगे तुम्हारे साथ और नहीं मानेंगे तुम्हारे बारे में किसी की (बात) कभी और यदि तुमसे युध्द हुआ तो हम अवश्य तुम्हारी सहायता करेंगे तथा अल्लाह गवाह है कि वे झूठे हैं।
यदि वे निकाले गये तो ये उनके साथ नहीं निकलेंगे और यदि उनसे युध्द हो, तो वे उनकी सहायता नहीं करेंगे और यदि उनकी सहायता की (भी,) तो अवश्य पीठ दिखा देंगे, फिर कहीं से कोई सहायता नहीं पायेंगे।
वे नहीं युध्द करेंगे तुमसे एकत्र होकर, परन्तु ये कि दुर्ग बंद बस्तियों में हों अथवा किसी दीवार की आड़ से। उनका युध्द आपस में बहुत कड़ा है। आप उन्हें एकत्र समझते हैं, जबकि उनके दिल अलग अलग हैं। ये इसलिए कि वे निर्बोध होते हैं।
(उनका उदाहरण) शैतान जैसा है कि वह कहता है मनुष्य से कि कुफ़्र कर, फिर जब वह काफ़िर हो गया, तो कह दिया कि मैं तुझसे विरक्त (अलग) हूँ। मैं तो डरता हूँ अल्लाह, सर्वलोक के पालनहार से।
हे लोगो जो ईमान लाये हो! अल्लाह से डरो और देखना चाहिये प्रत्येक को कि उसने क्या भेजा है कल के लिए तथा डरते रहो अल्लाह से, निश्चय अल्लाह सूचित है उससे, जो तुम करते हो।
यदि हम अवतरित करते इस क़ुर्आन को किसी पर्वत पर, तो आप उसे देखते कि झुका जा रहा है तथा कण-कण होता जा रहा है, अल्लाह के भय से और इन उदाहरणों का वर्णन हम लोगों के लिए कर रहे हैं, ताकि वे सोच-विचार करें। वह खुले तथा छुपे का जानने वाला है। वही अत्यंत कृपाशील, दयावान् है।
वह अल्लाह ही है, जिसके अतिरिक्त नहीं है[1] कोई सच्चा वंदनीय। वह सबका स्वामी, अत्यंत पवित्र, सर्वथा शान्ति प्रदान करने वाला, रक्षक, प्रभावशाली, शक्तिशाली बल पूर्वक आदेश लागू करने वाला, बड़ाई वाला है। पवित्र है अल्लाह उससे, जिसे वे (उसका) साझी बनाते हैं।
वही अल्लाह है, पैदा करने वाला, बनाने वाला, रूप देने वाला। उसी के लिए शुभ नाम हैं, उसकी पवित्रता का वर्णन करता है जो (भी) आकाशों तथा धरती में है और वह प्रभावशाली, ह़िक्मत वाला है।