ये पुस्तक है, जो आपकी ओर उतारी गयी है। अतः (हे नबी!) आपके मन में इससे कोई संकोच न हो, ताकि आप इसके द्वारा सावधान करें[1] और ईमान वालों के लिए उपदेश है।
और हमने तुम्हें पैदा किया[1], फिर तुम्हारा रूप बनाया, फिर हमने फ़रिश्तों से कहा कि आदम को सज्दा करो, तो इब्लीस के सिवा सबने सज्दा किया। वह सज्दा करने वालों में से न हुआ।
अल्लाह ने उससे कहाः किस बात ने तुझे सज्दा करने से रोक दिया, जबकि मैंने तुझे आदेश दिया था? उसने कहाः मैं उससे उत्तम हूँ। मेरी रचना तूने अग्नि से की है और उसकी मिट्टी से।
तो शैतान ने दोनों को संशय में डाल दिया, ताकि दोनों के लिए उनके गुप्तांगों को खोल दे, जो उनसे छुपाये गये थे और कहाः तुम्हारे पालनहार ने तुम दोनों को इस वृक्ष से केवल इसलिए रोक दिया है कि तुम दोनों फ़रिश्ते अथवा सदावासी हो जाओगे।
तो उन दोनों को धोखे से रिझा लिया। फिर जब दोनों ने उस वृक्ष का स्वाद लिया, तो उनके लिए उनके गुप्तांग खुल गये और वे उनपर स्वर्ग के पत्ते चिपकाने लगे और उन्हें उनके पालनहार ने आवाज़ दीः क्या मैंने तुम्हें इस वृक्ष से नहीं रोका था और तुम दोनों से नहीं कहा था कि शैतान तुम्हारा खुला शत्रु है
हे आदम के पुत्रो! हमने तुमपर ऐसा वस्त्र उतार दिया है, जो तुम्हारे गुप्तांगों को छुपाता तथा शोभा है और अल्लाह की आज्ञाकारिता का वस्त्र ही सर्वोत्तम है। ये अल्लाह की आयतों में से एक है, ताकि वे शिक्षा लें[1]।
हे आदम के पुत्रो! ऐसा न हो कि शैतान तुम्हें बहका दे, जैसे तुम्हारे माता-पिता को स्वर्ग से निकाल दिया, उनके वस्त्र उतरवा दिये, ताकि उन्हें उनके गुप्तांग दिखा दे। वास्तव में, वह तथा उसकी जाति, तुम्हें ऐसे स्थान से देखती है, जहाँ से तुम उन्हें नहीं देख सकते। वास्तव में, हमने शैतानों को उनका सहायक बना दिया है, जो ईमान नहीं रखते।
तथा जब वे (मुश्रिक) कोई निर्लज्जा का काम करते हैं, तो कहते हैं कि इसी (रीति) पर हमने अपने पूर्वजों को पाया है तथा अल्लाह ने हमें इसका आदेश दिया है। (हे नबी!) आप उनसे कह दें कि अल्लाह कभी निर्लज्जा का आदेश नहीं देता। क्या तुम अल्लाह पर ऐसी बात का आरोप धरते हो, जिसे तुम नहीं जानते
आप उनसे कह दें कि मेरे पालनहार ने न्याय का आदेश दिया है। (और वो ये है कि) प्रत्येक मस्जिद में नमाज़ के समय अपना ध्यान सीधे उसी की ओर करो[1] और उसके लिए धर्म को विशुध्द करके उसी को पुकारो। जिस प्रकार, उसने तुम्हें पहले पैदा किया है, उसी प्रकार, (प्रलय में) फिर जीवित कर दिये जाओगे।
एक समुदाय को उसने सुपथ दिखा दिया और दूसरा समुदाय कुपथ पर स्थित रह गया। वास्तव में, इन लोगों ने अल्लाह के सिवा शैतानों को सहायक बना लिया, फिर भी वे समझते हैं कि वास्तव में वही सुपथ पर हैं।
हे आदम के पुत्रो! प्रत्येक मस्जिद के पास (नमाज़ के समय) अपनी शोभा धारण करो,[1] खाओ-पिओ और बेजा ख़र्च न करो। वस्तुतः, वह बेजा ख़र्च करने वालों से प्रेम नहीं करता।
(हे नबी!) इन (मिश्रणवादियों) से कहिए कि किसने अल्लाह की उस शोभा को ह़राम (वर्जित) किया है,[1] जिसे उसने अपने सेवकों के लिए निकाला है? तथा स्वच्छ जीविकाओं को? आप कह दें: ये सांसारिक जीवन में उनके लिए (उचित) है, जो ईमान लाये तथा प्रलय के दिन उन्हीं के लिए विशेष[2] है। इसी प्रकार, हम अपनी आयतों का सविस्तार वर्णन उनके लिए करते हैं, जो ज्ञान रखते हों।
(हे नबी!) आप कह दें कि मेरे पालनहार ने तो केवल खुले तथा छुपे कुकर्मों, पाप तथा अवैध विद्रोह को ही ह़राम (वर्जित) किया है तथा इस बात को कि तुम उसे अल्लाह का साझी बनाओ, जिसका कोई तर्क उसने नहीं उतारा है तथा अल्लाह पर ऐसी बात बोलो, जिसे तुम नहीं जानते।
हे आदम के पुत्रो! जब तुम्हारे पास तुम्हीं में से रसूल आ जायें जो तुम्हें मेरी आयतें सुना रहे हों, तो जो डरेगा और अपना सुधार कर लेगा, उसके लिए कोई डर नहीं होगा और न वे[1] उदासीन होंगे।
फिर उससे बड़ा अत्याचारी कौन है, जो अल्लाह पर मिथ्या बातें बनाये अथवा उसकी आयतों को मिथ्या कहे? उन्हें उनके भाग्य में लिखा भाग मिल जायेगा। यहाँ तक कि जिस समय हमारे फ़रिश्ते उनका प्राण निकालने के लिए आयेंगे, तो उनसे कहेंगे कि वे कहाँ हैं, जिन्हें तुम अल्लाह के सिवा पुकारते थे? वे कहेंगे कि वे तो हमसे खो गये तथा अपने ही विरूध्द साक्षी (गवाह) बन जायेंगे कि वस्तुतः वे काफ़िर थे।
अल्लाह का आदेश होगा कि तुम भी प्रवेश कर जाओ, उन समुदायों में, जो तुमसे पहले के जिन्नों और मनुष्यों में से नरक में। जब भी कोई समुदाय नरक में प्रवेश करेगा, तो अपने समान दूसरे समुदाय को धिक्कार करेगा, यहाँ तक कि जब उसमें सब एकत्र हो जायेंगे, तो उनका पिछला अपने पहले के लिए कहेगाः हे हमारे पालनहार! इन्होंने ही हमें कुपथ किया है। अतः इन्हें दुगनी यातना दे। वह (अल्लाह) कहेगाः तुममें से प्रत्येक के लिए दुगनी यातना है, परन्तु तुम्हें ज्ञान नहीं।
तथा उनका पहला समुदाय अपने दूसरे समुदाय से कहेगाः (यदि हम दोषी थे) तो हमपर तुम्हारी कोई प्रधानता नहीं[1] हुई, तो तुम अपने कुकर्मों की यातना का स्वाद लो।
वास्तव में, जिन्होंने हमारी आयतों को झुठला दिया और उनसे अभिमान किया, उनके लिए आकाश के द्वार नहीं खोले जायेंगे और न वे स्वर्ग में प्रवेश करेंगे, जब तक[1] ऊँट सूई के नाके से पार न हो जाये और हम इसी प्रकार अपराधियों को बदला देते हैं।
तथा उनके दिलों में जो द्वेष होगा, उसे हम निकाल देंगे[1]। उन (स्वर्गों में) बहती नहरें होंगी तथा वे कहेंगे कि उस अल्लाह की प्रशंसा है, जिसने हमें इसकी राह दिखाई और यदि अल्लाह हमें मार्गदर्शन न देता, तो हमें मार्गदर्शन न मिलता। हमारे पालनहार के रसूल सत्य लेकर आये तथा उन्हें पुकारा जायेगा कि इस स्वर्ग के अधिकारी तुम अपने सत्कर्मों के कारण हुए हो।
तथा स्वर्गवासी नरकवासियों को पुकारेंगे कि हमें, हमारे पालनहार ने जो वचन दिया था, उसे हमने सच पाया, तो क्या तुम्हारे पानलहार ने तुम्हें जो वचन दिया था, उसे तुमने सच पाया? वे कहेंगे कि हाँ! फिर उनके बीच एक पुकारने वाला पुकारेगा कि अल्लाह की धिक्कार है, उन अत्याचारियों पर।
और दोनों (नरक तथा स्वर्ग) के बीच एक परदा होगा और कुछ लोग आराफ़[1] (ऊँचाइयों) पर होंगे, जो प्रत्येक को उनके लक्षणों से पहचानेंगे और स्वर्ग वासियों को पुकारकर उन्हें सलाम करेंगे और उन्होंने उसमें प्रवेश नहीं किया होगा, परन्तु उसकी आशा रखते होंगे।
फिर आराफ़ (ऊँचाइयों) के लोग कुछ लोगों को उनके लक्षणों से पहचान जायेंगे[1], उनसे कहेंगे कि (देखो!) तुम्हारे जत्थे और तुम्हारा घमंड तुम्हारे किसी काम नहीं आया
(और स्वर्गवासियों की ओर संकेत करेंगे कि) क्या यही वे लोग नहीं हैं, जिनके संबंध में तुम शपथ लेकर कह रहे थे कि अल्लाह इन्हें अपनी दया में से कुछ नहीं देगा? (आज उनसे कहा जा रहा है कि) स्वर्ग में प्रवेश कर जाओ, न तुमपर किसी प्रकार का भय है और न तुम उदासीन होगे।
तथा नरकवासी स्वर्गवासियों को पुकारेंगे कि हमपर तनिक पानी डाल दो अथवा जो अल्लाह ने तुम्हें प्रदान किया है, उसमें से कुछ दे दो। वे कहेंगे कि अल्लाह ने ये दोनों (आज) काफ़िरों के लिए ह़राम (वर्जित) कर दिया है।
(उसका निर्णय है कि) जिन्होंने अपने धर्म को तमाशा और खेल बना लिया था तथा जिन्हें सांसारिक जीवन ने धोखे में डाल रखा था, तो आज हम उन्हें ऐसे ही भुला देंगे, जिस प्रकार उन्होंने आज के दिन के आने को भुला दिया था[1] और इसलिए भी कि वे हमारी आयतों का इन्कार करते रहे।
जबकि हमने उनके लिए एक ऐसी पुस्तक दी, जिसे हमने ज्ञान के आधार पर सविस्तार वर्णित कर दिया है, जो मार्गदर्शन तथा दया है, उन लोगों के लिए, जो ईमान (विश्वास) रखते हैं।
(फिर) क्या वे इसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं कि इसका परिणाम सामने आ जाये? जिस दिन इसका परिणाम आ जायेगा, तो वही, जो इससे पहले इसे भूले हुए थे, कहेंगे कि हमारे पालनहार के रसूल सच लेकर आए थे, (परन्तु हमने नहीं माना) तो क्या हमारे लिए कोई अनुशंसक (सिफ़ारिशी) है, जो हमारी अनुशंसा (सिफ़ारिश) करे? अथवा हम संसार में फेर दिए जायेँ, तो जो कर्म हम करते रहे, उनके विपरीत कर्म करेंगे! उनहोंने स्वयं को छति में डाल दिया तथा उनसे जो मिथ्या बातें बना रहे थे खो गईं।
तुम्हारा पालनहार वही अल्लाह है, जिसने आकाशों तथा धरती को छः दिनों में बनाया[1], फिर अर्श (सिंहासन) पर स्थित हो गया। वह रात्रि से दिन को ढक देता है, दिन उसके पीछे दौड़ता हुआ आ जाता है, सूर्य तथा चाँद और तारे उसकी आज्ञा के अधीन हैं। सुन लो! वही उत्पत्तिकार है और वही शासक[2] है। वही अल्लाह अति शुभ संसार का पालनहार है।
तथा धरती में उसके सुधार के पश्चात्[1] उपद्रव न करो और उसीसे डरते हुए तथा आशा रखते हुए[2] प्रार्थना करो। वास्तव में, अल्लाह की दया सदाचारियों के समीप है।
और वही है, जो अपनी दया (वर्षा) से पहले वायुओं को (वर्षा) की शुभ सूचना देने के लिए भेजता है और जब वे भारी बादलों को लिए उड़ती हैं, तो हम उसे किसी निर्जीव धरती को (जीवित) करने के लिए पहुँचा देते हैं, फिर उससे जल वर्षा कर, उसके द्वारा प्रत्येक प्रकार के फल उपजा देते हैं। इसी प्रकार, हम मुर्दों को जीवित करते हैं, ताकि तुम शिक्षा ग्रहण कर सको।
और स्वच्छ भूमि अपनी उपज अल्लाह की अनुमति से भरपूर देती है तथा खराब भूमि की उपज थोड़ी ही होती है। इसी प्रकार, हम अपनी[1] आयतें (निशानियाँ) उनके लिए दुहराते हैं, जो शुक्र अदा करते हैं।
हमने नूह़[1] को उसकी जाति की ओर (अपना संदेश पहुँचाने के लिए) भेजा था, तो उसने कहाः हे मेरी जाति के लोगो! (केवल) अल्लाह की इबादत (वंदना) करो, उसके सिवा तुम्हारा कोई पूज्य नहीं। मैं तुमपर एक बड़े दिन की यातना से डरता हूँ।
क्या तुम्हें इसपर आश्चर्य हो रहा है कि तुम्हारे पालनहार की शिक्षा तुम्हीं में से एक पुरुष द्वारा तुम्हारे पास आ गयी है, ताकि वह तुम्हें सावधान करे और ताकि तुम आज्ञाकारी बनो और अल्लाह की दया के योग्य हो जाओ
फिर भी उन्होंने उसे झुठला दिया। तो हमने उसे और जो नौका में उसके साथ थे, उन्हें बचा लिया और उन्हें डुबो दिया, जो हमारी आयतों को झुठला चुके थे। वास्तव में, वह (समझ-बूझ के) अंधे थे।
(और इसी प्रकार) आद[1] की ओर उनके भाई हूद को (भेजा)। उसने कहाः हे मेरी जाति! अल्लाह की इबादत (वंदना) करो, उसके सिवा तुम्हारा कोई पूज्य नहीं। तो क्या तुम (उसकी अवज्ञा से) नहीं डरते
(इसपर) उनकी जाति में से उन प्रमुखों ने कहा, जो काफ़िर हो गये कि हमें ऐसा लग रहा है कि तुम नासमझ हो गये हो और वास्तव में हम तुम्हें झूठों में समझ रहे हैं।
क्या तुम्हें इसपर आश्चर्य हो रहा है कि तुम्हारे पालनहार की शिक्षा, तुम्हीं में से एक पुरुष द्वारा तुम्हारे पास आ गई है, ताकि वह तुम्हें सावधान करे? तथा याद करो कि अल्लाह ने नूह़ की जाति के पश्चात तुम्हें धरती में अधिकार दिया है और तुम्हें अधिक शारीरिक बल दिया है। अतः अल्लाह के पुरस्कारों को याद[1] करो। संभवतः तुम सफल हो जाओगे।
उन्होंने कहाः क्या तुम हमारे पास इसलिए आये हो कि हम केवल एक ही अल्लाह की इबादत (वंदना) करें और उन्हें छोड़ दें, जिनकी पूजा हमारे पूर्वज करते आ रहे हैं? तो वो बात हमारे पास ला दो, जिससे हमें डरा रहे हो, यदि तुम सच्चे हो
उसने कहाः तुमपर तुम्हारे पालनहार का प्रकोप और क्रोध आ पड़ा है। क्या तुम मुझसे कुछ (मूर्तियों के) नामों के विषय में विवाद कर रहे हो, जिनका तुमने तथा तुम्हारे पूर्वजों ने (पूज्य) नाम रखा है, जिसका कोई तर्क (प्रमाण) अल्लाह ने नहीं उतारा है? तो तुम (प्रकोप की) प्रतीक्षा करो और तुम्हारे साथ मैं भी प्रतीक्षा कर रहा हूँ।
और (इसी प्रकार) समूद[1] (जाति) के पास उनके भाई सालेह़ को भेजा। उसने कहाः हे मेरी जाति! अल्लाह की (वंदना) करो, उसके सिवा तुम्हारा कोई पूज्य नहीं। तुम्हारे पास तुम्हारे पालनहार की ओर से खुला प्रमाण (चमत्कार) आ गया है। ये अल्लाह की ऊँटनी तुम्हारे लिए एक चमत्कार[2] है। अतः इसे अल्लाह की धरती में चरने के लिए छोड़ दो और इसे बुरे विचार से हाथ न लगाना, अन्यथा तुम्हें दुःखदायी यातना घेर लेगी।
तथा याद करो कि अल्लाह ने आद जाति के ध्वस्त किए जाने के पश्चात् तुम्हें धरती में अधिकार दिया है और तुम्हें धरती में बसाया है, तुम उसके मैदानों में भवन बनाते हो और पर्वतों को तराशकर घर बनाते हो। अतः अल्लाह के उपकारों को याद करो और धरती में उपद्रव करते न फिरो।
उसकी जाति के घमंडी प्रमुखों ने उन निर्बलों से कहा, जो उनमें से ईमान लाये थेः क्या तुम विश्वास रखते हो कि सालेह़ अपने पालनहार का भेजा हुआ है? उन्होंने कहाः निश्चय जिस (संदेश) के साथ वह भेजा गया है, हम उसपर ईमान (विश्वास) रखते हैं।
फिर उन्होंने ऊँटनी को वध कर दिया और अपने पालनहार के आदेश का उल्लंघन किया और कहाः हे सालेह़! तू हमें जिस (यातना) की धमकी दे रहा था, उसे ले आ, यदि तू वास्तव में रसूलों में है।
तो सालेह़ ने उनसे मुँह फेर लिया और कहाः हे मेरी जाति! मैंने तुम्हें अपने पालनहार के उपदेश पहुँचा दिये थे और मैंने तुम्हारा भला चाहा। परन्तु तुम उपकारियों से प्रेम नहीं करते।
तथा मद्यन[1] की ओर हमने उसके भाई शोऐब को रसूल बनाकर भेजा। उसने कहः हे मेरी जाति के लोगो! अल्लाह की इबादत (वंदना) करो, उसके सिवा तुम्हारा कोई पूज्य नहीं है। तुम्हारे पास तुम्हारे पालनहार का खुला तर्क (प्रमाण) आ गया है। अतः नाप और तोल पूरी करो और लोगों की चीज़ों में कमी न करो तथा धरती में उसके सुधार के पश्चात उपद्रव न करो। यही तुम्हारे लिए उत्त्म है, यदि तुम ईमान वाले हो।
तथा प्रत्येक मार्ग पर लोगों को धमकाने के लिए न बैठो और उन्हें अल्लाह की राह से न रोको, जो उसपर ईमान लाये[1] हैं और उसे टेढ़ा न बनाओ तथा उस समय को याद करो, जब तुम थोड़े थे, तो तुम्हें अल्लाह ने अधिक कर दिया तथा देखो कि उपद्रवियों का परिणाम क्या हुआ
और यदि तुम्हारा एक समुदाय उसपर ईमान लाया है, जिसके साथ मैं भेजा गया हूँ और दूसरा ईमान नहीं लाया है, तो तुम धैर्य रखो, यहाँ तक कि अल्लाह हमारे बीच निर्णय कर दे और वह उत्तम न्याय करने वाला है।
उसकी जाति के प्रमुखों ने, जिन्हें घमंड था, कहा कि हे शोऐब! हम तुम्हें तथा जो तुम्हारे साथ ईमान लाये हैं, अपने नगर से अवश्य निकाल देंगे अथवा तुम सबको हमारे धर्म में अवश्य वापस आना होगा। (शोऐब) ने कहाः क्या यदि हम उसे दिल से न मानें तो
हमने अल्लाह पर मिथ्या आरोप लगाया है, यदि तुम्हारे धर्म में इसके पश्चात वापस आ गये, जबकि हमें अल्लाह ने उससे मुक्त कर दिया है और हमारे लिए संभव नहीं कि उसमें फिर आ जायें, परन्तु ये कि हमारा पालनहार चाहता हो। हमारा पालनहार प्रत्येक वस्तु को अपने ज्ञान में समोये हुए है, अल्लाह ही पर हमारा भरोसा है। हे हमारे पालनहार! हमारे और हमारी जाति के बीच न्याय के साथ निर्णय कर दे और तू ही उत्तम निर्णयकारी है।
तो शोऐब उनसे विमुख हो गया तथा कहाः हे मेरी जाति! मैंने तुम्हें अपने पालनहार के संदेश पहुँचा दिये, तथा तुम्हारा हितकारी रहा। तो काफ़िर जाति (के विनाश) पर कैसे शोक करूँ
फिर हमने आपदा को सुःख सुविधा से बदल दिया, यहाँ तक कि जब वे सुःखी हो गये और उन्होंने कहा कि हमारे पूर्वजों को भी दुःख तथा सुख पहुँचता रहा है, तो अकस्मात् हमने उन्हें पकड़ लिया और वे समझ नहीं सके।
और यदि इन नगरों के वासी ईमान लाते और कुकर्मों से बचे रहते, तो हम उनपर आकाशों तथा धरती की सम्पन्नता के द्वार खोल देते। परन्तु उन्होंने झुठला दिया। अतः, हमने उनके करतूतों के कारण उन्हें (यातना में) घेर लिया।
तो क्या उनको शिक्षा नहीं मिली, जो धरती के वारिस होते हैं, उसके अगले वासियों के पश्चात् कि यदि हम चाहें, तो उनके पापों के बदले उन्हें आपदा में ग्रस्त कर दें और उनके दिलों पर मुहर लगा दें, फिर वे कोई बात ही न सुन सकें
(हे नबी!) ये वे नगर हैं, जिनकी कथा हम आपको सुना रहे हैं। इन सबके पास उनके रसूल खुले तर्क (प्रमाण) लाये, तो वे ऐसे न थे कि उस सत्य पर विश्वास कर लें, जिसे वे इससे पूर्व झुठला[1] चुके थे। इसी प्रकार, अल्लाह काफ़िरों के दिलों पर मुहर लगाता है।
फिर हमने इन रसूलों के पश्चात् मूसा को अपनी आयतों (चमत्कारों) के साथ फ़िरऔन[1] और उसके प्रमुखों के पास भेजा, तो उन्होंने भी हमारी आयतों के साथ अन्याय किया, तो देखो कि उपद्रवियों का क्या परिणाम हुआ
मेरे लिए यही योग्य है कि अल्लाह के विषय में सत्य के अतिरिक्त कोई बात न करूँ। मैं तुम्हारे पास तुम्हारे पालनहार की ओर से खुला प्रमाण लाया हूँ। इसलिए मेरे साथ बनी इस्राईल[1] को जाने दो।
फ़िरऔन ने कहाः इससे पहले कि मैं तुम्हें अनुमति दूँ, तुम उसपर ईमान ले आये? वास्तव में, ये षड्यंत्र है, जिसे तुमने नगर में रचा है, ताकि उसके निवासियों को उससे निकाल दो! तो शीघ्र ही तुम्हें इस (के परिणाम) का ज्ञान हो जायेगा।
तू हमसे इसी बात का तो बदला ले रहा है कि हमारे पास हमारे पालनहार की आयतें (निशानियाँ) आ गयीं? तो हम उनपर ईमान ला चुके हैं। हे हमारे पालनहार! हमपर धैर्य (की धारा) उंडेल दे! और हमें इस दशा में (संसार से) उठा कि तेरे आज्ञाकारी रहें।
और फ़िरऔन की जाति के प्रमुखों ने (उससे) कहाः क्या तुम मूसा और उसकी जाति को छोड़ दोगे कि देश में विद्रोह करें तथा तुम्हें और तुम्हारे पूज्यों[1] को छोड़ दें? उसने कहाः हम उनके पुत्रों को वध कर देंगे और उनकी स्त्रियों को जीवित रहने देंगे, हम उनपर दबाव रखते हैं।
मूसा ने अपनी जाति से कहाः अल्लाह से सहायता माँगो और सहन करो, वास्तव में, धरती अल्लाह की है, वह अपने भक्तों में जिसे चाहे, उसका वारिस (उत्तराधिकारी) बना देता है और अन्त उन्हीं के लिए है, जो आज्ञाकारी हों।
उन्होंने कहाः हम तुम्हारे आने से पहले भी सताये गये और तुम्हारे आने के पश्चात् भी (सताये जा रहे हैं)! मूसा ने कहाः समीप है कि तुम्हारा पालनहार तुम्हारे शत्रु का विनाश कर दे और तुम्हें देश में अधिकारी बना दे। फिर देखे कि तुम्हारे कर्म कैसे होते हैं
तो जब उनपर सम्पन्नता आती, तो कहते कि हम इसके योग्य हैं और जब अकाल पड़ता, तो मूसा और उसके साथियों से बुरा सगुन लेते। सुन लो! उनका बुरा सगुम तो अल्लाह के पास[1] था, परन्तु अधिक्तर लोग इसका ज्ञान नहीं रखते।
अन्ततः, हमने उनपर तूफ़ान (उग्र वर्षा), टिड्डी दल, जुयें, मेढक और रक्त की वर्षा भेजी। अलग-अलग निशानियाँ; फिर भी उन्होंने अभिमान किया और वे थी ही अपराधी जाति।
और जब उनपर यातना आ पड़ी, तो उन्होंने कहाः हे मूसा! तू अपने पालनहार से उस वचन के कारण, जो उसने तुझे दिया है, हमारे लिए प्रार्थना कर। यदि तूने (अपनी प्रार्थना से) हमसे यातना दूर कर दी, तो हम अवश्य तेरा विश्वास कर लेंगे और बनी इस्राईल को तेरे साथ जाने की अनुमति देंगे।
अन्ततः, हमने उनसे बदला लिया और उन्हें सागर में डुबो दिया, इस कारण कि उन्होंने हमारी आयतों (निशानियों) को झुठला दिया और उनसे निश्चेत हो गये। उनके धैर्य रखने के कारण तथा हमने उसे ध्वस्त कर दिया, जो फ़िरऔन और उसकी जाति कलाकारी कर रही थी और जो बेलें छप्परों पर चढ़ रही थीं।
और हमने उस जाति (बनी इस्राईल) को, जो निर्बल समझे जा रहे थे, धरती (शाम देश) के पश्चिमों तथा पूर्वों का, जिसमें हमने बरकत दी थी, अधिकारी बना दिया और (इस प्रकार हे नबी!) आपके पालनहार का शुभ वचन बनी इस्राईल के लिए पूरा हो गया, उनके धैर्य रखने के कारण तथा हमने उसे धवस्त कर दिया, जो फ़िरऔन और उसकी जाति कलाकारी कर रही थी और जो बेलें छप्परों पर चढ़ा रहे थे[1]।
और बनी इस्राईल को हमने सागर पार करा दिया, तो वे एक जाति के पास से होकर गये, जो अपनी मूर्तियों की पूजा कर रही थी, उन्होंने कहाः हे मूसा! हमारे लिए वैसा ही एक पूज्य बना दीजिये, जैसे इनके पूज्य हैं। मूसा ने कहाः वास्तव में, तुम अज्ञान जाति हो।
तथा उस समय को याद करो, जब हमने तुम्हें फ़िरऔन की जाति से बचाया। वह तुम्हें घोर यातना दे रहे थे; तुम्हारे पुत्रों को वध कर रहे थे और तुम्हारी स्त्रियों को जीवित रख रहे थे और इसमें तुम्हारे पालनहार की ओर से भारी परीक्षा थी।
और हमने मूसा को तीस रातों का वचन[1] दिया और उसकी पूर्ती दस रातों से कर दी, तो तेरे पालनहार की निर्धारित अवधि चालीस रात पूरी हो गयी तथा मूसा ने अपने भाई हारून से कहाः तुम मेरी जाति में मेरा प्रतिनिधि रहना, सुधार करते रहना और उपद्रवकारियों की नीति न अपनाना।
और जब मूसा हमारे निर्धारित समय पर आ गया और उसके पालनहार ने उससे बात की, तो उसने कहाः हे मेरे पालनहार! मेरे लिए अपने आपको दिखा दे, ताकि मैं तेरा दर्शन कर लूँ। अल्लाहने कहाः तू मेरा दर्शन नहीं कर सकेगा। परन्तु इस पर्वत की ओर देख! यदि ये अपने स्थान पर स्थिर रह गया, तो तू मेरा दर्शन कर सकेगा। फिर जब उसका पालनहार पर्वत की ओर प्रकाशित हुआ, तो उसे चूर-चूर कर दिया और मूसा निश्चेत होकर गिर गया। फिर जब चेतना आयी, तो उसने कहाः तू पवित्र है! मैं तुझसे क्षमा माँगता हूँ। तथा मैं सर्व प्रथम[1] ईमान लाने वालों में से हूँ।
अल्लाह ने कहाः हे मूसा! मैंने तुझे लोगों पर प्रधानता देकर अपने संदेशों तथा अपने वार्तालाप द्वारा निर्वाचित कर लिया है। अतः जो कुछ तुझे प्रदान किया है, उसे ग्रहण कर ले और कृतज्ञों में हो जा।
और हमने उसके लिए तख़्तियों पर (धर्म के) प्रत्येक विषय के लिए निर्देश और प्रत्येक बात का विवरण लिख दिया। (तथा कहा कि) इसे दृढ़ता से पकड़ लो और अपनी जाति को आदेश दो कि उसके उत्तम निर्देशों का पालन करे और मैं तुम्हें अवैज्ञाकरियों का घर दिखा दूँगा।
मैं उन्हें[1] अपनी आयतों (निशानियों) से फेर[2] दूँगा, जो धरती में अवैध अभिमान करते हैं, यदि वे प्रत्येक आयत (निशानी) देख लें, तब भी उसपर ईमान नहीं लायेंगे; यदि वे सुपथ देखेंगे, तो उसे नहीं अपनायेंगे और यदि कुपथ देख लें, तो उसे अपना लेंगे। ये इस कारण कि उन्होंने हमारी आयतों (निशानियों) को झुठला दिया और उनसे निश्चेत रहे।
और जिन लोगों ने हमारी आयतों तथा प्रलोक (में हमसे) मिलने को झुठला दिया, उन्हीं के कर्म व्यर्थ हो गये और उन्हें उसी का बदला मिलेगा, जो कुकर्म वे कर रहे थे।
और मूसा की जाति ने उसके (पर्वत पर जाने के) पश्चात् अपने आभूषणों से एक बछड़े की मूर्ति बना ली, जिससे गाय के डकारने के समान ध्वनि निकलती थी। क्या उन्होंने ये नहीं सोचा कि न तो वह उनसे बात[1] करता है और न किसी प्रकार का मार्गदर्शन देता है? उन्होंने उसे बना लिया तथा वे अत्याचारी थे।
और जब वे (अपने किये पर) लज्जित हुए और समझ गये कि वे कुपथ हो गये हैं, तो कहने लगेः यदि हमारे पालनहार ने हमपर दया नहीं की और हमें क्षमा नहीं किया, तो हम अवश्य विनाशों में हो जायेंगे।
और जब मूसा अपनी जाति की ओर क्रोध तथा दुःख से भरा हुआ वापस आया, तो उसने कहाः तुमने मेरे पश्चात् मेरा बहुत बुरा प्रतिनिधित्व किया। क्या तुम अपने पालनहार की आज्ञा से पहले ही जल्दी कर[1] गये? तथा उसने लेख तख़्तियाँ डाल दीं तथा अपने भाई (हारून) का सिर पकड़ के अपनी ओर खींचने लगा। उसने कहाः हे मेरे माँ जाये भाई! लोगों ने मुझे निर्बल समझ लिया तथा समीप था कि वे मुझे मार डालें। अतः तू शत्रुओं को मुझपर हँसने का अवसर न दे। मुझे अत्याचारियों का साथी न बना।
जिन लोगों ने बछड़े को पूज्य बनाया, उनपर उनके पालनहार का प्रकोप आयेगा और वे सांसारिक जीवन में अपमानित होंगे और इसी प्रकार हम झूठ घड़ने वालों को दण्ड देते हैं।
फिर जब मूसा का क्रोध शान्त हो गया, तो उसने लेख तख़्तियाँ उठा लीं, जिनके लिखे आदेशों में मार्गदर्शन तथा दया थी, उन लोगों के लिए, जो अपने पालनहार से ही डरते हों।
और मूसा ने हमारे निर्धारित[1] समय के लिए अपनी जाति के सत्तर व्यक्तियों को चुन लिया और जब उन्हें भूकंप ने घेर[2] लिया, तो मूसा ने कहाः हे मेरे पालनहार! यदि तू चाहता तो इन सबका इससे पहले ही विनाश कर देता और मेरा भी। क्या तू हमारा उस कुकर्म के कारण नाश कर देगा, जो हममें से कुछ निर्बोध कर गये? ये[3] तेरी ओर से केवल एक परीक्षा थी। तू जिसे चाहे, उसके द्वारा कुपथ कर दे और जिसे चाहे, सुपथ दर्शा दे। तू ही हमारा संरक्षक है, अतः हमारे पापों को क्षमा कर दे और हमपर दया कर, तू सर्वोत्तम क्षमावान् है।
और हमारे लिए इस संसार में भलाई लिख दे तथा परलोक में भी, हम तेरी ओर लौट आये। उस (अल्लाह) ने कहाः मैं अपनी यातना जिसे चाहता हूँ, देता हूँ। और मेरी दया प्रत्येक चीज़ को समोये हुए है। मैं उसे उन लोगों के लिए लिख दूँगा, जो अवज्ञा से बचेंगे, ज़कात देंगे और जो हमारी आयतों पर ईमान लायेंगे।
जो उस रसूल का अनुसरण करेंगे, जो उम्मी नबी[1] हैं, जिन (के आगमन) का उल्लेख वे अपने पास तौरात तथा इंजील में पाते हैं; जो सदाचार का आदेश देंगे और दुराचार से रोकेंगे, उनके लिए स्वच्छ चीज़ों को ह़लाल (वैध) तथा मलिन चीज़ों को ह़राम (अवैध) करेंगे, उनसे उनके बोझ उतार देंगे तथा उन बंधनों को खोल देंगे, जिनमें वे जकड़े हुए होंगे। अतः जो लोग आपपर ईमान लाये, आपका समर्थन किया, आपकी सहायता की तथा उस प्रकाश (क़ुर्आन) का अनुसरण किया, जो आपके साथ उतारा गया, तो वही सफल होंगे।
(हे नबी!) आप लोगों से कह दें कि हे मानव जाति के लोगो! मैं तुम सभी की ओर उस अल्लाह का रसूल हूँ, जिसके लिए आकाश तथा धरती का राज्य है। कोई वंदनीय (पूज्य) नहीं है, परन्तु वही, जो जीवन देता तथा मारता है। अतः अल्लाह पर ईमान लाओ और उसके उस उम्मी नबी पर, जो अल्लाह पर और उसकी सभी (आदि) पुस्तकों पर ईमान रखते हैं और उनका अनुसरण करो, ताकि तुम मार्गदर्शन पा जाओ[1]।
और[1] हमने मूसा की जाति के बारह घरानों को बारह जातियों में विभक्त कर दिया और हमने मूसा की ओर वह़्यी भेजी, जब उसकी जाति ने उससे जल माँगा कि अपनी लाठी इस पत्थर पर मारो, तो उससे बारह स्रोत उबल पड़े तथा प्रत्येक समुदाय ने अपने पीने का स्थान जान लिया और उनपर बादलों की छाँव की और उनपर मन्न तथा सल्वा उतारा। (हमने कहाः) इन स्वच्छ चीज़ों में से, जो हमने तुम्हें प्रदान की हैं, खाओ और हमने उनपर अत्याचार नहीं किया, परन्तु वे स्वयं (अवज्ञा करके) अपने प्राणों पर अत्याचार कर रहे थे।
और जब उन (बनी इस्राईल) से कहा गया कि इस नगर (बैतुल मक़्दिस) में बस जाओ और उसमें से जहाँ इच्छा हो, खाओ और कहो कि हमें क्षमा कर दे तथा द्वार से सज्दा करते हुए प्रवेश करो, हम तुम्हारे लिए तुम्हारे दोष क्षमा कर देंगे और सत्कर्मियों को और अधिक देंगे।
तो उनमें से अत्याचारियों ने उस बात को, दूसरी बात से[1] बदल दिया, जो उनसे कही गयी थी। तो हमने उनपर आकाश से प्रकोप उतार दिया। क्योंकि वे अत्याचार कर रहे थे।
तथा (हे नबी!) इनसे उस नगरी के सम्बंध में प्रश्न करो, जो समुद्र (लाल सागर) के समीप थी, जब उसके निवासी सब्त (शनिवार) के दिन के विषय में आज्ञा का उल्लंघन[1] कर रहे थे, जब उनके पास उनकी मछलियाँ सब्त के दिन पानी के ऊपर तैरकर आ जाती थीं और सब्त का दिन न हो, तो नहीं आती थीं। इसी प्रकार, उनकी अवज्ञा के कारण हम उनकी परीक्षा ले रहे थे।
तथा जब उनमें से एक समुदाय ने कहा कि तुम उन्हें क्यों समझा रहे हो, जिन्हें अल्लाह (उनकी अवज्ञा के कारण) ध्वस्त करने अथवा कड़ा दण्ड देने वाला है? उन्होंने कहाः तुम्हारे पालनहार के समक्ष क्षम्य होने के लिए और इस आशा में कि वे आज्ञाकारी हो जायेँ[1]।
फिर जब उन्होंने जो कुछ उन्हें स्मरण कराया गया, उसे भुला दिया, तो हमने उन लोगों को बचा लिया, जो उन्हें बुराई से रोक रहे थे और हमने अत्याचारियों को कड़ी यातना में उनकी अवज्ञा के कारण घेर लिया।
और याद करो, जब आपके पालनहार ने घोषणा कर दी कि वह प्रलय के दिन तक, उन (यहूदियों) पर उन्हें प्रभुत्व देता रहेगा, जो उन्हें घोर यातना देते रहेंगे[1]। निःसंदेह आपका पालनहार शीघ्र दण्ड देने वाला है और वह अति क्षमाशील, दयावान (भी) है।
और हमने उन्हें धरती में कई सम्प्रदायों में विभक्त कर दिया, उनमें कुछ सदाचारी थे और कुछ इसके विपरीत थे। हमने अच्छाईयों तथा बुराईयों, दोनों के द्वारा उनकी परीक्षा ली, ताकि वे (कुकर्मों से) रुक जायेँ।
फिर उनके पीछे कुछ ऐसे लोगों ने उनकी जगह ली, जो पुस्तक के उत्तराधिकारी होकर भी तुच्छ संसार का लाभ समेटने लगे और कहने लगे कि हमें क्षमा कर दिया जायेगा और यदि उसी के समान उन्हें लाभ हाथ आ जाये, तो उसे भी ले लेंगे। क्या उनसे पुस्तक का दृढ़ वचन नहीं लिया गया है कि अल्लाह पर सच ही बोलेंगे, जबकि पुस्तक में जो कुछ है, उसका अध्ययन कर चुके हैं? और परलोक का घर (स्वर्ग) उत्तम है, उनके लिए जो अल्लाह से डरते हों। तो क्या वे इतना भी नहीं[1] समझते
और जब हमने उनके ऊपर पर्वत को इस प्रकार छा दिया, जैसे वह कोई छतरी हो और उन्हें विश्वास हो गया कि वह उनपर गिर पड़ेगा, (तथा ये आदेश दिया कि) जो (पुस्तक) हमने तुम्हें प्रदान की है, उसे दृढ़ता से थाम लो तथा उसमें जो कुछ है, उसे याद रखो, ताकि तुम आज्ञाकारी हो जाओ।
तथा (वह समय याद करो) जब आपके पालनहार ने आदम के पुत्रों की पीठों से उनकी संतति को निकाला और उन्हें स्वयं उनपर साक्षी (गवाह) बनाते हुए कहाः क्या मैं तुम्हारा पालनहार नहीं हूँ? सबने कहाः क्यों नहीं? हम (इसके) साक्षी[1] हैं; ताकि प्रलय के दिन ये न कहो कि हम तो इससे असूचित थे।
अथवा ये कहो कि हमसे पूर्व हमारे पूर्वजों ने शिर्क (मिश्रण) किया और हम उनके पश्चात् उनकी संतान थे। तो क्या तू गुमराहों के कर्म के कारण हमारा विनाश[1] करेगा
और उन्हें उसकी दशा पढ़कर सुनायें, जिसे हमने अपनी आयतों (का ज्ञान) दिया, तो वह उस (के खोल से) निकल गया। फिर शैतान उसके पीछे लग गया और वह कुपथों में हो गया।
और यदि हम चाहते, तो उन (आयतों) के द्वारा उसका पद ऊँचा कर देते, परन्तु वह माया-मोह में पड़ गया और अपनी मनमानी करने लगा। तो उसकी दशा उस कुत्ते के समान हो गयी, जिसे हाँको, तब भी जीभ निकाले हाँपता रहे और छोड़ दो, तब भी जीभ निकाले हाँपता है। यही उपमा है, उन लोगों की, जो हमारी आयतों को झुठलाते हैं। तो आप ये कथायें उन्हें सुना दें, संभवतः वे सोच-विचार करें।
और बहुत-से जिन्न और मानव को हमने नरक के लिए पैदा किया है। उनके पास दिल हैं, जिनसे सोच-विचार नहीं करते, उनकी आँखें हैं, जिनसे[1] नहीं देखते और कान हैं, जिनसे नहीं सुनते। वे पशुओं के समान हैं; बल्कि उनसे भी अधिक कुपथ हैं, यही लोग अचेतना में पड़े हुए हैं।
और अल्लाह ही के शुभ नाम हैं, अतः उसे उन्हीं के द्वारा पुकारो और उन्हें छोड़ दो, जो उसके नामों में परिवर्तन[1] करते हैं, उन्हें शीघ्र ही उनके कुकर्मों का कुफल दे दिया जायेगा।
क्या उन्होंने आकाशों तथा धरती के राज्य को और जो कुछ अल्लाह ने पैदा किया है, उसे नहीं देखा[1]? और (येभी नहीं सोचा कि) हो सकता है कि उनका (निर्धारित) समय समीप आ गया हो? तो फिर इस (क़ुर्आन) के पश्चात् वह किस बात पर ईमान लायेंगे
(हे नबी!) वे आपसे प्रलय के विषय में प्रश्न करते हैं कि वह कब आयेगी? कह दो कि उसका ज्ञान तो मेरे पालनहार के पास है, उसे उसके समय पर वही प्रकाशित कर देगा। वह आकाशों तथा धरती में भारी होगी, तुमपर अकस्मात आ जायेगी। वह आपसे ऐसे प्रश्न कर रहे हैं, जैसे कि आप उसी की खोज में लगे हुए हों। आप कह दें कि उसका ज्ञान अल्लाह ही को है। परन्तु[1] अधिकांश लोग इस (तथ्य) को नहीं जानते।
आप कह दें कि मुझे तो अपने लाभ और हानि का अधिकार नहीं, परन्तु जो अल्लाह चाहे, (वही होता है)। यदि मैं ग़ैब (परोक्ष) का ज्ञान रखता, तो मैं बहुत सा लाभ प्राप्त कर लेता। मैं तो केवल उन लोगों को सावधान करने तथा शुभ सूचना देने वाला हूँ, जो ईमान (विश्वास) रखते हैं।
वही (अल्लाह) है, जिसने तुम्हारी उत्पत्ति एक जीव[1] से की और उसीसे उसका जोड़ा बनाया, ताकि उससे उसे संतोष मिले। फिर जब किसी[2] ने उस (अपनी स्त्री) से सहवास किया, तो उस (स्त्री) को हल्का सा गर्भ हो गया। जिसके साथ वह चलती फिरती रही, फिर जब बोझल हो गयी, तो दोनों (पति-पत्नी) ने अपने पालनहार से प्रार्थना कीः यदि तू हमें एक अच्छा बच्चा प्रदान करेगा, तो हम अवश्य तेरे कृतज्ञ (आभारी) होंगे।
और जब उन दोनों को (अल्लाह ने) एक स्वस्थ बच्चा प्रदान कर दिया, तो अल्लाह ने जो प्रदान किया, उसमें दूसरों को उसका साझी बनाने लगे। तो अल्लाह इनके शिर्क[1] की बातों से बहुत ऊँचा है।
वास्तव में, अल्लाह के सिवा जिनको तुम पुकारते हो, वे तुम्हारे जैसे ही (अल्लाह के) दास हैं। अतः तुम उनसे प्रार्थना करो, फिर वे तुम्हारी प्रार्थना का उत्तर दें, यदि उनके बारे में तुम्हारे विचार सत्य हैं
क्या इन (पत्थर की मूर्तियों) के पाँव हैं, जिनसे चलती हों? उनके हाथ हैं, जिनसे पकड़ती हों, उनकी आँखें हैं, जिनसे देखती हों? अथवा कान हैं, जिनसे सुनती हों? आप कह दें कि अपने साझियों को पुकार लो, फिर मेरे विरुध्द उपाय कर लो और मुझे कोई अवसर न दो
और यदि तुम उन्हें सीधी राह की ओर बुलाओ, तो वे सुन नहीं सकते और (हे नबी!) आप उन्हें देखेंगे कि वे आपकी ओर देख रहे हैं, जबकि वास्तव में वे कुछ नहीं देखते।
और जब आप, इन मिश्रणवादियों के पास कोई निशानी न लायेंगे, तो कहेंगे कि क्यों (अपनी ओर से) नहीं बना ली? आप कह दें कि मैं केवल उसी का अनुसरण करता हूँ, जो मेरे पालनहार के पास से मेरी ओर वह़्यी की जाती है। ये सूझ की बातें हैं, तुम्हारे पालनहार की ओर से (प्रमाण) हैं तथा मार्गदर्शन और दया हैं, उन लोगों के लिए जो ईमान (विश्वास) रखते हों।
वास्तव में, जो (फ़रिश्ते) आपके पालनहार के समीप हैं, वे उसकी इबादत (वंदना) से अभिमान नहीं करते, उसकी पवित्रता वर्णन करते रहते हैं और उसी को सज्दा[1] करते हैं।