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Hindi - Chapter 20 - Ta-Ha

Translation by Suhel Farooq Khan And Saifur Rahman Nadwi — Permalink

Verse 1 — Surah Ta-Ha 20:1

ऐ ता हा (रसूलअल्लाह)

Verse 2 — Surah Ta-Ha 20:2

हमने तुम पर कुरान इसलिए नाज़िल नहीं किया कि तुम (इस क़दर) मशक्क़त उठाओ

Verse 3 — Surah Ta-Ha 20:3

मगर जो शख्स खुदा से डरता है उसके लिए नसीहत (क़रार दिया है)

Verse 4 — Surah Ta-Ha 20:4

(ये) उस शख्स की तरफ़ से नाज़िल हुआ है जिसने ज़मीन और ऊँचे-ऊँचे आसमानों को पैदा किया

Verse 5 — Surah Ta-Ha 20:5

वही रहमान है जो अर्श पर (हुक्मरानी के लिए) आमादा व मुस्तईद है

Verse 6 — Surah Ta-Ha 20:6

जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है और जो कुछ दोनों के बीच में है और जो कुछ ज़मीन के नीचे है (ग़रज़ सब कुछ) उसी का है

Verse 7 — Surah Ta-Ha 20:7

और अगर तू पुकार कर बात करे (तो भी आहिस्ता करे तो भी) वह यक़ीनन भेद और उससे ज्यादा पोशीदा चीज़ को जानता है

Verse 8 — Surah Ta-Ha 20:8

अल्लाह (वह माबूद है कि) उसके सिवा कोइ माबूद नहीं है (अच्छे-अच्छे) उसी के नाम हैं

Verse 9 — Surah Ta-Ha 20:9

और (ऐ रसूल) क्या तुम तक मूसा की ख़बर पहुँची है कि जब उन्होंने दूर से आग देखी

Verse 10 — Surah Ta-Ha 20:10

तो अपने घर के लोगों से कहने लगे कि तुम लोग (ज़रा यहीं) ठहरो मैंने आग देखी है क्या अजब है कि मैं वहाँ (जाकर) उसमें से एक अंगारा तुम्हारे पास ले आऊँ या आग के पास किसी राह का पता पा जाऊँ

Verse 11 — Surah Ta-Ha 20:11

फिर जब मूसा आग के पास आए तो उन्हें आवाज आई

Verse 12 — Surah Ta-Ha 20:12

कि ऐ मूसा बेशक मैं ही तुम्हारा परवरदिगार हूँ तो तुम अपनी जूतियाँ उतार डालो क्योंकि तुम (इस वक्त) तुआ (नामी) पाक़ीज़ा चटियल मैदान में हो

Verse 13 — Surah Ta-Ha 20:13

और मैंने तुमको पैग़म्बरी के वास्ते मुन्तख़िब किया (चुन लिया) है तो जो कुछ तुम्हारी तरफ़ वही की जाती है उसे कान लगा कर सुनो

Verse 14 — Surah Ta-Ha 20:14

इसमें शक नहीं कि मैं ही वह अल्लाह हूँ कि मेरे सिवा कोई माबूद नहीं तो मेरी ही इबादत करो और मेरी याद के लिए नमाज़ बराबर पढ़ा करो

Verse 15 — Surah Ta-Ha 20:15

(क्योंकि) क़यामत ज़रूर आने वाली है और मैं उसे लामहौला छिपाए रखूँगा ताकि हर शख्स (उसके ख़ौफ से नेकी करे) और वैसी कोशिश की है उसका उसे बदला दिया जाए

Verse 16 — Surah Ta-Ha 20:16

तो (कहीं) ऐसा न हो कि जो शख्स उसे दिल से नहीं मानता और अपनी नफ़सियानी ख्वाहिश के पीछे पड़ा वह तुम्हें इस (फिक्र) से रोक दे तो तुम तबाह हो जाओगे

Verse 17 — Surah Ta-Ha 20:17

और ऐ मूसा ये तुम्हारे दाहिने हाथ में क्या चीज़ है

Verse 18 — Surah Ta-Ha 20:18

अर्ज़ की ये तो मेरी लाठी है मैं उस पर सहारा करता हूँ और इससे अपनी बकरियों पर (और दरख्तों की) पत्तियाँ झाड़ता हूँ और उसमें मेरे और भी मतलब हैं

Verse 19 — Surah Ta-Ha 20:19

फ़रमाया ऐ मूसा उसको ज़रा ज़मीन पर डाल तो दो मूसा ने उसे डाल दिया

Verse 20 — Surah Ta-Ha 20:20

तो फ़ौरन वह साँप बनकर दौड़ने लगा (ये देखकर मूसा भागे)

Verse 21 — Surah Ta-Ha 20:21

तो फ़रमाया कि तुम इसको पकड़ लो और डरो नहीं मैं अभी इसकी पहली सी सूरत फिर किए देता हूँ

Verse 22 — Surah Ta-Ha 20:22

और अपने हाथ को समेंट कर अपने बग़ल में तो कर लो (फिर देखो कि) वह बग़ैर किसी बीमारी के सफेद चमकता दमकता हुआ निकलेगा ये दूसरा मौजिज़ा है

Verse 23 — Surah Ta-Ha 20:23

(ये) ताकि हम तुमको अपनी (कुदरत की) बड़ी-बड़ी निशानियाँ दिखाएँ

Verse 24 — Surah Ta-Ha 20:24

अब तुम फिरऔन के पास जाओ उसने बहुत सर उठाया है

Verse 25 — Surah Ta-Ha 20:25

मूसा ने अर्ज़ की परवरदिगार (मैं जाता तो हूँ)

Verse 26 — Surah Ta-Ha 20:26

मगर तू मेरे लिए मेरे सीने को कुशादा फरमा

Verse 27 — Surah Ta-Ha 20:27

और दिलेर बना और मेरा काम मेरे लिए आसान कर दे और मेरी ज़बान से लुक़नत की गिरह खोल दे

Verse 28 — Surah Ta-Ha 20:28

ताकि लोग मेरी बात अच्छी तरह समझें और

Verse 29 — Surah Ta-Ha 20:29

मेरे कीनेवालों में से मेरे भाई हारून

Verse 30 — Surah Ta-Ha 20:30

को मेरा वज़ीर बोझ बटाने वाला बना दे

Verse 31 — Surah Ta-Ha 20:31

उसके ज़रिए से मेरी पुश्त मज़बूत कर दे

Verse 32 — Surah Ta-Ha 20:32

और मेरे काम में उसको मेरा शरीक बना

Verse 33 — Surah Ta-Ha 20:33

ताकि हम दोनों (मिलकर) कसरत से तेरी तसबीह करें

Verse 34 — Surah Ta-Ha 20:34

और कसरत से तेरी याद करें

Verse 35 — Surah Ta-Ha 20:35

तू तो हमारी हालत देख ही रहा है

Verse 36 — Surah Ta-Ha 20:36

फ़रमाया ऐ मूसा तुम्हारी सब दरख्वास्तें मंज़ूर की गई

Verse 37 — Surah Ta-Ha 20:37

और हम तो तुम पर एक बार और एहसान कर चुके हैं

Verse 38 — Surah Ta-Ha 20:38

जब हमने तुम्हारी माँ को इलहाम किया जो अब तुम्हें ''वही'' के ज़रिए से बताया जाता है

Verse 39 — Surah Ta-Ha 20:39

कि तुम इसे (मूसा को) सन्दूक़ में रखकर सन्दूक़ को दरिया में डाल दो फिर दरिया उसे ढकेल कर किनारे डाल देगा कि मूसा को मेरा दुशमन और मूसा का दुशमन (फिरऔन) उठा लेगा और मैंने तुम पर अपनी मोहब्बत को डाल दिया जो देखता (प्यार करता) ताकि तुम मेरी ख़ास निगरानी में पाले पोसे जाओ

Verse 40 — Surah Ta-Ha 20:40

(उस वक्त) ज़ब तुम्हारी बहन चली (और फिर उनके घर में आकर) कहने लगी कि कहो तो मैं तुम्हें ऐसी दाया बताऊँ कि जो इसे अच्छी तरह पाले तो (इस तदबीर से) हमने फिर तुमको तुम्हारी माँ के पास पहुँचा दिया ताकि उसकी ऑंखें ठन्डी रहें और तुम्हारी (जुदाई पर) कुढ़े नहीं और तुमने एक शख्स (क़िबती) को मार डाला था और सख्त परेशान थे तो हमने तुमको (इस) ग़म से नजात दी और हमने तुम्हारा अच्छी तरह इम्तिहान कर लिया फिर तुम कई बरस तक मदयन के लोगों में जाकर रहे ऐ मूसा फिर तुम (उम्र के) एक अन्दाजे पर आ गए नबूवत के क़ायल हुए

Verse 41 — Surah Ta-Ha 20:41

और मैंने तुमको अपनी रिसालत के वास्ते मुन्तख़िब किया

Verse 42 — Surah Ta-Ha 20:42

तुम अपने भाई समैत हमारे मौजिज़े लेकर जाओ और (देखो) मेरी याद में सुस्ती न करना

Verse 43 — Surah Ta-Ha 20:43

तुम दोनों फिरऔन के पास जाओ बेशक वह बहुत सरकश हो गया है

Verse 44 — Surah Ta-Ha 20:44

फिर उससे (जाकर) नरमी से बातें करो ताकि वह नसीहत मान ले या डर जाए

Verse 45 — Surah Ta-Ha 20:45

दोनों ने अर्ज़ की ऐ हमारे पालने वाले हम डरते हैं कि कहीं वह हम पर ज्यादती (न) कर बैठे या ज्यादा सरकशी कर ले

Verse 46 — Surah Ta-Ha 20:46

फ़रमाया तुम डरो नहीं मैं तुम्हारे साथ हूँ (सब कुछ) सुनता और देखता हूँ

Verse 47 — Surah Ta-Ha 20:47

ग़रज़ तुम दोनों उसके पास जाओ और कहो कि हम आप के परवरदिगार के रसूल हैं तो बनी इसराइल को हमारे साथ भेज दीजिए और उन्हें सताइए नहीं हम आपके पास आपके परवरदिगार का मौजिज़ा लेकर आए हैं और जो राहे रास्त की पैरवी करे उसी के लिए सलामती है

Verse 48 — Surah Ta-Ha 20:48

हमारे पास खुदा की तरफ से ये ''वही'' नाज़िल हुईहै कि यक़ीनन अज़ाब उसी शख्स पर है जो (खुदा की आयतों को) झुठलाए

Verse 49 — Surah Ta-Ha 20:49

और उसके हुक्म से मुँह मोड़े (ग़रज़ गए और कहा) फिरऔन ने पूछा ऐ मूसा आख़िर तुम दोनों का परवरदिगार कौन है

Verse 50 — Surah Ta-Ha 20:50

मूसा ने कहा हमारा परवरदिगार वह है जिसने हर चीज़ को उसके (मुनासिब) सूरत अता फरमाई

Verse 51 — Surah Ta-Ha 20:51

फिर उसी ने ज़िन्दगी बसर करने के तरीक़े बताए फिरऔन ने पूछा भला अगले लोगों का हाल (तो बताओ) कि क्या हुआ

Verse 52 — Surah Ta-Ha 20:52

मूसा ने कहा इन बातों का इल्म मेरे परवरदिगार के पास एक किताब (लौहे महफूज़) में (लिखा हुआ) है मेरा परवरदिगार न बहकता है न भूलता है

Verse 53 — Surah Ta-Ha 20:53

वह वही है जिसने तुम्हारे (फ़ायदे के) वास्ते ज़मीन को बिछौना बनाया और तुम्हारे लिए उसमें राहें निकाली और उसी ने आसमान से पानी बरसाया फिर (खुदा फरमाता है कि) हम ही ने उस पानी के ज़रिए से मुख्तलिफ़ क़िस्मों की घासे निकाली

Verse 54 — Surah Ta-Ha 20:54

(ताकि) तुम खुद भी खाओ और अपने चारपायों को भी चराओ कुछ शक नहीं कि इसमें अक्लमन्दों के वास्ते (क़ुदरते खुदा की) बहुत सी निशानियाँ हैं

Verse 55 — Surah Ta-Ha 20:55

हमने इसी ज़मीन से तुम को पैदा किया और (मरने के बाद) इसमें लौटा कर लाएँगे और उसी से दूसरी बार (क़यामत के दिन) तुमको निकाल खड़ा करेंगे

Verse 56 — Surah Ta-Ha 20:56

और मैंने फिरऔन को अपनी सारी निशानियाँ दिखा दी

Verse 57 — Surah Ta-Ha 20:57

इस पर भी उसने सबको झुठला दिया और न माना (और) कहने लगा ऐ मूसा क्या तुम हमारे पास इसलिए आए हो

Verse 58 — Surah Ta-Ha 20:58

कि हम को हमारे मुल्क (मिस्र से) अपने जादू के ज़ोर से निकाल बाहर करो अच्छा तो (रहो) हम भी तुम्हारे सामने ऐसा जादू पेश करते हैं फिर तुम अपने और हमारे दरमियान एक वक्त मुक़र्रर करो कि न हम उसके ख़िलाफ करे और न तुम और मुक़ाबला एक साफ़ खुले मैदान में हो

Verse 59 — Surah Ta-Ha 20:59

मूसा ने कहा तुम्हारे (मुक़ाबले) की मीयाद ज़ीनत (ईद) का दिन है और उस रोज़ सब लोग दिन चढ़े जमा किए जाँए

Verse 60 — Surah Ta-Ha 20:60

उसके बाद फिरऔन (अपनी जगह) लौट गया फिर अपने चलत्तर (जादू के सामान) जमा करने लगा

Verse 61 — Surah Ta-Ha 20:61

फिर (मुक़ाबले को) आ मौजूद हुआ मूसा ने (फ़िरऔनियों से) कहा तुम्हारा नास हो खुदा पर झूठी-झूठी इफ्तेरा परदाज़ियाँ न करो वरना वह अज़ाब (नाज़िल करके) इससे तुम्हारा मटियामेट कर छोड़ेगा

Verse 62 — Surah Ta-Ha 20:62

और (याद रखो कि) जिसने इफ्तेरा परदाज़ियाँ न की वह यकीनन नामुराद रहा उस पर वह लोग अपने काम में बाहम झगड़ने और सरगोशियाँ करने लगे

Verse 63 — Surah Ta-Ha 20:63

(आख़िर) वह लोग बोल उठे कि ये दोनों यक़ीनन जादूगर हैं और चाहते हैं कि अपने जादू (के ज़ोर) से तुम लोगों को तुम्हारे मुल्क से निकाल बाहर करें और तुम्हारे अच्छे ख़ासे मज़हब को मिटा छोड़ें

Verse 64 — Surah Ta-Ha 20:64

तो तुम भी खूब अपने चलत्तर (जादू वग़ैरह) दुरूस्त कर लो फिर परा (सफ़) बाँध के (उनके मुक़ाबले में) आ पड़ो और जो आज डर रहा हो वही फायज़ुलहराम रहा

Verse 65 — Surah Ta-Ha 20:65

ग़रज़ जादूगरों ने कहा (ऐ मूसा) या तो तुम ही (अपने जादू) फेंको और या ये कि पहले जो जादू फेंके वह हम ही हों

Verse 66 — Surah Ta-Ha 20:66

मूसा ने कहा (मैं नहीं डालूँगा) बल्कि तुम ही पहले डालो (ग़रज़ उन्होंने अपने करतब दिखाए) तो बस मूसा को उनके जादू (के ज़ोर से) ऐसा मालूम हुआ कि उनकी रस्सियाँ और उनकी छड़ियाँ दौड़ रही हैं

Verse 67 — Surah Ta-Ha 20:67

तो मूसा ने अपने दिल में कुछ दहशत सी पाई

Verse 68 — Surah Ta-Ha 20:68

हमने कहा (मूसा) इस से डरो नहीं यक़ीनन तुम ही वर रहोगे

Verse 69 — Surah Ta-Ha 20:69

और तुम्हारे दाहिने हाथ में जो (लाठी) है उसे डाल तो दो कि जो करतब उन लोगों ने की है उसे हड़प कर जाए क्योंकि उन लोगों ने जो कुछ करतब की वह एक जादूगर की करतब है और जादूगर जहाँ जाए कामयाब नहीं हो सकता

Verse 70 — Surah Ta-Ha 20:70

(ग़रज मूसा की लाटी ने) सब हड़प कर लिया (ये देखते ही) वह सब जादूगर सजदे में गिर पड़े (और कहने लगे) कि हम मूसा और हारून के परवरदिगार पर ईमान ले आए

Verse 71 — Surah Ta-Ha 20:71

फिरऔन ने उन लोगों से कहा (हाए) इससे पहले कि हम तुमको इजाज़त दें तुम उस पर ईमान ले आए इसमें शक नहीं कि ये तुम सबका बड़ा (गुरू) है जिसने तुमको जादू सिखाया है तो मैं तुम्हारा एक तरफ़ के हाथ और दूसरी तरफ़ के पाँव ज़रूर काट डालूँगा और तुम्हें यक़ीनन खुरमे की शाख़ों पर सूली चढ़ा दूँगा और उस वक्त तुमको (अच्छी तरह) मालूम हो जाएगा कि हम (दोनों) फरीक़ों से अज़ाब में ज्यादा बढ़ा हुआ कौन और किसको क़याम ज्यादा है

Verse 72 — Surah Ta-Ha 20:72

जादूगर बोले कि ऐसे वाजेए व रौशन मौजिज़ात जो हमारे सामने आए उन पर और जिस (खुदा) ने हमको पैदा किया उस पर तो हम तुमको किसी तरह तरजीह नहीं दे सकते तो जो तुझे करना हो कर गुज़र तो बस दुनिया की (इसी ज़रा) ज़िन्दगी पर हुकूमत कर सकता है

Verse 73 — Surah Ta-Ha 20:73

(और कहा) हम तो अपने परवरदिगार पर इसलिए ईमान लाए हैं ताकि हमारे वास्ते सारे गुनाह माफ़ कर दे और (ख़ास कर) जिस पर तूने हमें मजबूर किया था और खुदा ही सबसे बेहतर है

Verse 74 — Surah Ta-Ha 20:74

और (उसी को) सबसे ज्यादा क़याम है इसमें शक नहीं कि जो शख्स मुजरिम होकर अपने परवरदिगार के सामने हाज़िर होगा तो उसके लिए यक़ीनन जहन्नुम (धरा हुआ) है जिसमें न तो वह मरे ही गा और न ज़िन्दा ही रहेगा

Verse 75 — Surah Ta-Ha 20:75

(सिसकता रहेगा) और जो शख्स उसके सामने ईमानदार हो कर हाज़िर होगा और उसने अच्छे-अच्छे काम भी किए होंगे तो ऐसे ही लोग हैं जिनके लिए बड़े-बड़े बुलन्द रूतबे हैं

Verse 76 — Surah Ta-Ha 20:76

वह सदाबहार बाग़ात जिनके नीचे नहरें जारी हैं वह लोग उसमें हमेशा रहेंगे और जो गुनाह से पाक व पाकीज़ा रहे उस का यही सिला है

Verse 77 — Surah Ta-Ha 20:77

और हमने मूसा के पास ''वही'' भेजी कि मेरे बन्दों (बनी इसराइल) को (मिस्र से) रातों रात निकाल ले जाओ फिर दरिया में (लाठी मारकर) उनके लिए एक सूखी राह निकालो और तुमको पीछा करने का न कोई खौफ़ रहेगा न (डूबने की) कोई दहशत

Verse 78 — Surah Ta-Ha 20:78

ग़रज़ फिरऔन ने अपने लशकर समैत उनका पीछा किया फिर दरिया (के पानी का रेला) जैसा कुछ उन पर छाया गया वह छा गया

Verse 79 — Surah Ta-Ha 20:79

और फिरऔन ने अपनी क़ौम को गुमराह (करके हलाक) कर डाला और उनकी हिदायत न की

Verse 80 — Surah Ta-Ha 20:80

ऐ बनी इसराइल हमने तुमको तुम्हारे दुश्मन (के पंजे) से छुड़ाया और तुम से (कोहेतूर) के दाहिने तरफ का वायदा किया और हम ही ने तुम पर मन व सलवा नाज़िल किया

Verse 81 — Surah Ta-Ha 20:81

और (फ़रमाया) कि हमने जो पाक व पाक़ीज़ा रोज़ी तुम्हें दे रखी है उसमें से खाओ (पियो) और उसमें (किसी क़िस्म की) शरारत न करो वरना तुम पर मेरा अज़ाब नाज़िल हो जाएगा और (याद रखो कि) जिस पर मेरा ग़ज़ब नाज़िल हुआ तो वह यक़ीनन गुमराह (हलाक) हुआ

Verse 82 — Surah Ta-Ha 20:82

और जो शख्स तौबा करे और ईमान लाए और अच्छे काम करे फिर साबित क़दम रहे तो हम उसको ज़रूर बख्शने वाले हैं

Verse 83 — Surah Ta-Ha 20:83

फिर जब मूसा सत्तर आदमियों को लेकर चले और खुद बढ़ आए तो हमने कहा कि (ऐ मूसा तुमने अपनी क़ौम से आगे चलने में क्यों जल्दी की)

Verse 84 — Surah Ta-Ha 20:84

ग़रज़ की वह भी तो मेरे ही पीछे चले आ रहे हैं और इसी लिए मैं जल्दी करके तेरे पास इसलिए आगे बढ़ आया हूँ ताकि तू (मुझसे) खुश रहे

Verse 85 — Surah Ta-Ha 20:85

फ़रमाया तो हमने तुम्हारे (आने के बाद) तुम्हारी क़ौम का इम्तिहान लिया और सामरी ने उनको गुमराह कर छोड़ा

Verse 86 — Surah Ta-Ha 20:86

(तो मूसा) गुस्से में भरे पछताए हुए अपनी क़ौम की तरफ पलटे और आकर कहने लगे ऐ मेरी (क़म्बख्त) क़ौम क्या तुमसे तुम्हारे परवरदिगार ने एक अच्छा वायदा (तौरेत देने का) न किया था तुम्हारे वायदे में अरसा लग गया या तुमने ये चाहा कि तुम पर तुम्हारे परवरदिगार का ग़ज़ब टूंट पड़े कि तुमने मेरे वायदे (खुदा की परसतिश) के ख़िलाफ किया

Verse 87 — Surah Ta-Ha 20:87

वह लोग कहने लगे हमने आपके वायदे के ख़िलाफ नहीं किया बल्कि (बात ये हुईकि फिरऔन की) क़ौम के ज़ेवर के बोझे जो (मिस्र से निकलते वक्त) हम पर लोग गए थे उनको हम लोगों ने (सामरी के कहने से आग में) डाल दिया फिर सामरी ने भी डाल दिया

Verse 88 — Surah Ta-Ha 20:88

फिर सामरी ने उन लोगों के लिए (उसी जेवर से) एक बछड़े की मूरत बनाई जिसकी आवाज़ भी बछड़े की सी थी उस पर बाज़ लोग कहने लगे यही तुम्हारा (भी) माबूद और मूसा का (भी) माबूद है मगर वह भूल गया है

Verse 89 — Surah Ta-Ha 20:89

भला इनको इतनी भी न सूझी कि ये बछड़ा न तो उन लोगों को पलट कर उन की बात का जवाब ही देता है और न उनका ज़रर ही उस के हाथ में है और न नफ़ा

Verse 90 — Surah Ta-Ha 20:90

और हारून ने उनसे पहले कहा भी था कि ऐ मेरी क़ौम तुम्हारा सिर्फ़ इसके ज़रिये से इम्तिहान किया जा रहा है और इसमें शक नहीं कि तम्हारा परवरदिगार (बस खुदाए रहमान है) तो तुम मेरी पैरवी करो और मेरा कहा मानो

Verse 91 — Surah Ta-Ha 20:91

तो वह लोग कहने लगे जब तक मूसा हमारे पास पलट कर न आएँ हम तो बराबर इसकी परसतिश पर डटे बैठे रहेंगे

Verse 92 — Surah Ta-Ha 20:92

मूसा ने हारून की तरफ ख़िताब करके कहा ऐ हारून जब तुमने उनको देख लिया था गमुराह हो गए हैं तो तुम्हें मेरी पैरवी (क़ताल) करने को किसने मना किया

Verse 93 — Surah Ta-Ha 20:93

तो क्या तुमने मेरे हुक्म की नाफ़रमानी की

Verse 94 — Surah Ta-Ha 20:94

हारून ने कहा ऐ मेरे माँजाए (भाई) मेरी दाढ़ी न पकडिऐ और न मेरे सर (के बाल) मैं तो उससे डरा कि (कहीं) आप (वापस आकर) ये (न) कहिए कि तुमने बनी इसराईल में फूट डाल दी और मेरी बात का भी ख्याल न रखा

Verse 95 — Surah Ta-Ha 20:95

तब सामरी से कहने लगे कि ओ सामरी तेरा क्या हाल है

Verse 96 — Surah Ta-Ha 20:96

उसने (जवाब में) कहा मुझे वह चीज़ दिखाई दी जो औरों को न सूझी (जिबरील घोड़े पर सवार जा रहे थे) तो मैंने जिबरील फरिश्ते (के घोड़े) के निशाने क़दम की एक मुट्ठी (ख़ाक) की उठा ली फिर मैंने (बछड़ों के क़ालिब में) डाल दी (तो वह बोलेने लगा)

Verse 97 — Surah Ta-Ha 20:97

और उस वक्त मुझे मेरे नफ्स ने यही सुझाया मूसा ने कहा चल (दूर हो) तेरे लिए (इस दुनिया की) ज़िन्दगी में तो (ये सज़ा है) तू कहता फ़िरेगा कि मुझे न छूना (वरना बुख़ार चढ़ जाएगा) और (आख़िरत में भी) यक़ीनी तेरे लिए (अज़ाब का) वायदा है कि हरगिज़ तुझसे ख़िलाफ़ न किया जाएगा और तू अपने माबूद को तो देख जिस (की इबादत) पर तू डट बैठा था कि हम उसे यक़ीनन जलाकर (राख) कर डालेंगे फिर हम उसे तितिर बितिर करके दरिया में उड़ा देगें

Verse 98 — Surah Ta-Ha 20:98

तुम्हारा माबूद तो बस वही ख़ुदा है जिसके सिवा कोई और माबूद बरहक़ नहीं कि उसका इल्म हर चीज़ पर छा गया है

Verse 99 — Surah Ta-Ha 20:99

(ऐ रसूल) हम तुम्हारे सामने यूँ वाक़ेयात बयान करते हैं जो गुज़र चुके और हमने ही तुम्हारे पास अपनी बारगाह से कुरान अता किया

Verse 100 — Surah Ta-Ha 20:100

जिसने उससे मुँह फेरा वह क़यामत के दिन यक़ीनन (अपने बुरे आमाल का) बोझ उठाएगा

Verse 101 — Surah Ta-Ha 20:101

और उसी हाल में हमेशा रहेंगे और क्या ही बुरा बोझ है क़यामत के दिन ये लोग उठाए होंगे

Verse 102 — Surah Ta-Ha 20:102

जिस दिन सूर फूँका जाएगा और हम उस दिन गुनाहगारों को (उनकी) ऑंखें पुतली (अन्धी) करके (आमने-सामने) जमा करेंगे

Verse 103 — Surah Ta-Ha 20:103

(और) आपस में चुपके-चुपके कहते होंगे कि (दुनिया या क़ब्र में) हम लोग (बहुत से बहुत) नौ दस दिन ठहरे होंगे

Verse 104 — Surah Ta-Ha 20:104

जो कुछ ये लोग (उस दिन) कहेंगे हम खूब जानते हैं कि जो इनमें सबसे ज्यादा होशियार होगा बोल उठेगा कि तुम बस (बहुत से बहुत) एक दिन ठहरे होगे

Verse 105 — Surah Ta-Ha 20:105

(और ऐ रसूल) तुम से लोग पहाड़ों के बारे में पूछा करते हैं (कि क़यामत के रोज़ क्या होगा)

Verse 106 — Surah Ta-Ha 20:106

तो तुम कह दो कि मेरा परवरदिगार बिल्कुल रेज़ा रेज़ा करके उड़ा डालेगा और ज़मीन को एक चटियल मैदान कर छोड़ेगा

Verse 107 — Surah Ta-Ha 20:107

कि (ऐ शख्स) न तो उसमें मोड़ देखेगा और न ऊँच-नीच

Verse 108 — Surah Ta-Ha 20:108

उस दिन लोग एक पुकारने वाले इसराफ़ील की आवाज़ के पीछे (इस तरह सीधे) दौड़ पड़ेगे कि उसमें कुछ भी कज़ी न होगी और आवाज़े उस दिन खुदा के सामने (इस तरह) घिघियाएगें कि तू घुनघुनाहट के सिवा और कुछ न सुनेगा

Verse 109 — Surah Ta-Ha 20:109

उस दिन किसी की सिफ़ारिश काम न आएगी मगर जिसको खुदा ने इजाज़त दी हो और उसका बोलना पसन्द करे जो कुछ उन लोगों के सामने है और जो कुछ उनके पीछे है

Verse 110 — Surah Ta-Ha 20:110

(ग़रज़ सब कुछ) वह जानता है और ये लोग अपने इल्म से उसपर हावी नहीं हो सकते

Verse 111 — Surah Ta-Ha 20:111

और (क़यामत में) सारी (खुदाई के) का मुँह ज़िन्दा और बाक़ी रहने वाले खुदा के सामने झुक जाएँगे और जिसने जुल्म का बोझ (अपने सर पर) उठाया वह यक़ीनन नाकाम रहा

Verse 112 — Surah Ta-Ha 20:112

और जिसने अच्छे-अच्छे काम किए और वह मोमिन भी है तो उसको न किसी तरह की बेइन्साफ़ी का डर है और न किसी नुक़सान का

Verse 113 — Surah Ta-Ha 20:113

हमने उसको उसी तरह अरबी ज़बान का कुरान नाज़िल फ़रमाया और उसमें अज़ाब के तरह-तरह के वायदे बयान किए ताकि ये लोग परहेज़गार बनें या उनके मिजाज़ में इबरत पैदा कर दे

Verse 114 — Surah Ta-Ha 20:114

पस (दो जहाँ का) सच्चा बादशाह खुदा बरतर व आला है और (ऐ रसूल) कुरान के (पढ़ने) में उससे पहले कि तुम पर उसकी ''वही'' पूरी कर दी जाए जल्दी न करो और दुआ करो कि ऐ मेरे पालने वाले मेरे इल्म को और ज्यादा फ़रमा

Verse 115 — Surah Ta-Ha 20:115

और हमने आदम से पहले ही एहद ले लिया था कि उस दरख्त के पास न जाना तो आदम ने उसे तर्क कर दिया

Verse 116 — Surah Ta-Ha 20:116

और हमने उनमें साबित व इस्तक़लाल न पाया और जब हमने फ़रिश्तों से कहा कि आदम को सजदा करो तो सबने सजदा किया मगर शैतान ने इन्कार किया

Verse 117 — Surah Ta-Ha 20:117

तो मैंने (आदम से कहा) कि ऐ आदम ये यक़ीनी तुम्हारा और तुम्हारी बीवी का दुशमन है तो कहीं तुम दोनों को बेहिश्त से निकलवा न छोड़े तो तुम (दुनिया की) मुसीबत में फँस जाओ

Verse 118 — Surah Ta-Ha 20:118

कुछ शक नहीं कि (बेहिश्त में) तुम्हें ये आराम है कि न तो तुम यहाँ भूके रहोगे और न नँगे

Verse 119 — Surah Ta-Ha 20:119

और न यहाँ प्यासे रहोगे और न धूप खाओगे

Verse 120 — Surah Ta-Ha 20:120

तो शैतान ने उनके दिल में वसवसा डाला (और) कहा ऐ आदम क्या मैं तम्हें (हमेशगी की ज़िन्दगी) का दरख्त और वह सल्तनत जो कभी ज़ाएल न हो बता दूँ

Verse 121 — Surah Ta-Ha 20:121

चुनान्चे दोनों मियाँ बीबी ने उसी में से कुछ खाया तो उनका आगा पीछा उनपर ज़ाहिर हो गया और दोनों बेहिश्त के (दरख्त के) पत्ते अपने आगे पीछे पर चिपकाने लगे और आदम ने अपने परवरदिगार की नाफ़रमानी की

Verse 122 — Surah Ta-Ha 20:122

तो (राहे सवाब से) बेराह हो गए इसके बाद उनके परवरदिगार ने बर गुज़ीदा किया

Verse 123 — Surah Ta-Ha 20:123

फिर उनकी तौबा कुबूल की और उनकी हिदायत की फरमाया कि तुम दोनों बेहश्त से नीचे उतर जाओ तुम में से एक का एक दुशमन है फिर अगर तुम्हारे पास मेरी तरफ से हिदायत पहुँचे तो (तुम) उसकी पैरवी करना क्योंकि जो शख्स मेरी हिदायत पर चलेगा न तो गुमराह होगा और न मुसीबत में फँसेगा

Verse 124 — Surah Ta-Ha 20:124

और जिस शख्स ने मेरी याद से मुँह फेरा तो उसकी ज़िन्दगी बहुत तंगी में बसर होगी और हम उसको क़यामत के दिन अंधा बना के उठाएँगे

Verse 125 — Surah Ta-Ha 20:125

वह कहेगा इलाही मैं तो (दुनिया में) ऑंख वाला था तूने मुझे अन्धा करके क्यों उठाया

Verse 126 — Surah Ta-Ha 20:126

खुदा फरमाएगा ऐसा ही (होना चाहिए) हमारी आयतें भी तो तेरे पास आई तो तू उन्हें भुला बैठा और इसी तरह आज तू भी भूला दिया जाएगा

Verse 127 — Surah Ta-Ha 20:127

और जिसने (हद से) तजाविज़ किया और अपने परवरदिगार की आयतों पर ईमान न लाया उसको ऐसी ही बदला देगें और आख़िरत का अज़ाब तो यक़ीनी बहुत सख्त और बहुत देर पा है

Verse 128 — Surah Ta-Ha 20:128

तो क्या उन (अहले मक्का) को उस (खुदा) ने ये नहीं बता दिया था कि हमने उनके पहले कितने लोगों को हलाक कर डाला जिनके घरों में ये लोग चलते फिरते हैं इसमें शक नहीं कि उसमें अक्लमंदों के लिए (कुदरते खुदा की) यक़ीनी बहुत सी निशानियाँ हैं

Verse 129 — Surah Ta-Ha 20:129

और (ऐ रसूल) अगर तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से पहले ही एक वायदा और अज़ाब का) एक वक्त मुअय्युन न होता तो (उनकी हरकतों से) फ़ौरन अज़ाब का आना लाज़मी बात थी

Verse 130 — Surah Ta-Ha 20:130

(ऐ रसूल) जो कुछ ये कुफ्फ़ार बका करते हैं तुम उस पर सब्र करो और आफ़ताब निकलने के क़ब्ल और उसके ग़ुरूब होने के क़ब्ल अपने परवरदिगार की हम्दोसना के साथ तसबीह किया करो और कुछ रात के वक़्तों में और दिन के किनारों में तस्बीह करो ताकि तुम निहाल हो जाओ

Verse 131 — Surah Ta-Ha 20:131

और (ऐ रसूल) जो उनमें से कुछ लोगों को दुनिया की इस ज़रा सी ज़िन्दगी की रौनक़ से निहाल कर दिया है ताकि हम उनको उसमें आज़माएँ तुम अपनी नज़रें उधर न बढ़ाओ और (इससे) तुम्हारे परवरदिगार की रोज़ी (सवाब) कहीं बेहतर और ज्यादा पाएदार है

Verse 132 — Surah Ta-Ha 20:132

और अपने घर वालों को नमाज़ का हुक्म दो और तुम खुद भी उसके पाबन्द रहो हम तुम से रोज़ी तो तलब करते नहीं (बल्कि) हम तो खुद तुमको रोज़ी देते हैं और परहेज़गारी ही का तो अन्जाम बखैर है

Verse 133 — Surah Ta-Ha 20:133

और (अहले मक्का) कहते हैं कि अपने परवरदिगार की तरफ से हमारे पास कोई मौजिज़ा हमारी मर्ज़ी के मुवाफिक़ क्यों नहीं लाते तो क्या जो (पेशीव गोइयाँ) अगली किताबों (तौरेत, इन्जील) में (इसकी) गवाह हैं वह भी उनके पास नहीं पहुँची

Verse 134 — Surah Ta-Ha 20:134

और अगर हम उनको इस रसूल से पहले अज़ाब से हलाक कर डालते तो ज़रूर कहते कि ऐ हमारे पालने वाले तूने हमारे पास (अपना) रसूल क्यों न भेजा तो हम अपने ज़लील व रूसवा होने से पहले तेरी आयतों की पैरवी ज़रूर करते

Verse 135 — Surah Ta-Ha 20:135

रसूल तुम कह दो कि हर शख्स (अपने अन्जामकार का) मुन्तिज़र है तो तुम भी इन्तिज़ार करो फिर तो तुम्हें बहुत जल्द मालूम हो जाएगा कि सीधी राह वाले कौन हैं (और कज़ी पर कौन हैं) हिदायत याफ़ता कौन है और गुमराह कौन है।