तथा रात और दिन के आने जाने में तथा अल्लाह ने आकाश से जो जीविका उतारी है, फिर जीवित किया है उसके द्वारा धरती को, उसके मरने के पश्चात् तथा हवाओं के फेरने में, बड़ी निशानियाँ हैं, उनके लिए, जो समझ-बूझ रखते हों।
जो अल्लाह की उन आयतों को, जो उसके सामने पढ़ी जायें सुने, फिर भी वह अकड़ता हुआ (कुफ़्र पर) अड़ा रहे, जैसे कि उन्हें सुना ही न हो! तो आप उसे दुःखदायी यातना की सूचना पहुँचा दें।
तथा उनके आगे नरक है और नहीं काम आयेगा उनके, जो कुछ उन्होंने कमाया है और न जिसे उन्होंने अल्लाह के सिवा संरक्षक बनाया है और उन्हीं के लिए कड़ी यातना है।
अल्लाह ही ने वश में किया है तुम्हारे लिए सागर को, ताकि नाव चलें उसमें उसके आदेश से और ताकि तुम खोज करो उसके अनुग्रह (दया) की और ताकि तुम उसके कृतज्ञ (आभारी) बनो।
तथा उसने तुम्हारी सेवा में लगा रखा है, जो कुछ आकाशों तथा धरती में है, सबको अपनी ओर से। वास्तव में, इसमें बहुत-सी निशानियाँ हैं, उनके लिए, जो सोच-विचार करें।
(हे नबी!) आप उनसे कह दें जो ईमान लाये हैं कि क्षमा कर[1] दें उन्हें, जो आशा नहीं रखते हैं अल्लाह के दिनों[2] की, ताकि वह बदला दे एक समुदाय को उनकी कमाई का।
तथा हमने प्रदान की इस्राईल की संतान को पुस्तक तथा राज्य और नबूअत (दूतत्व) और जीविका दी उन्हें, स्वच्छ चीज़ों से तथा प्रधानता दी उन्हें (उनके युग के) संसारवासियों पर।
तथा दिये हमने उन्हें, खुले आदेश। तो उन्होंने विभेद नहीं किया, परन्तु अपने पास ज्ञान[1] आ जाने के पश्चात्, आपस के द्वेष के कारण। निःसंदेह आपका पालनहार ही निर्णय करेगा उनके बीच परलय के दिन, जिस बात में वे विभेद कर रहे हैं।
क्या समझ रखा है जिन्होंने दुष्कर्म किया है कि हम कर देंगे उन्हें उनके समान, जो ईमान लाये तथा सदाचार किये हैं कि उनका जीवन तथा मरण समान[1] हो जाये? वे बुरा निर्णय कर रहे हैं।
तथा पैदा किया है अल्लाह ने आकाशों एवं धरती को, न्याय के साथ और ताकि बदला दिया जाये प्रत्येक प्राणी को, उसके कर्म का तथा उनपर अत्याचार नहीं किया जायेगा।
क्या आपने उसे देखा, जिसने बना लिया अपना पूज्य अपनी इच्छा को तथा कुपथ कर दिया अल्लाह ने उसे जानते हुए और मुहर लगा दी उसके कान तथा दिल पर और बना दिया उसकी आँख पर आवरण (पर्दा)? फिर कौन है, जो सीधी राह दिखायेगा उसे अल्लाह के पश्चात्? तो क्या तुम शिक्षा ग्रहण नहीं करते
तथा उन्होंने कहा कि हमारा यही सांसारिक जीवन है। हम यहीं मरते और जीते हैं और हमारा विनाश, युग (काल) ही करता है। उन्हें इसका ज्ञान नहीं। वे केवल अनुमान की बात[1] कर रहे हैं।
आप कह दें: अल्लाह ही तुम्हें जीवन देता तथा मारता है, फिर एकत्र करेगा तुम्हें प्रलय के दिन, जिसमें कोई संदेह नहीं। परन्तु अधिक्तर लोग (इस तथ्य को) नहीं[1] जानते।
तथा देखेंगे आप प्रत्येक समुदाय को घुटनों के बल गिरा हुआ। प्रत्येक समुदाय पुकारा जायेगा अपने कर्म-पत्र की ओर। आज, बदला दिया जायेगा तुम लोगों को, तुम्हारे कर्मों का।
तो जब कहा जाता था कि निश्चय अल्लाह का वचन सच है तथा प्रलय होने में तनिक भी संदेह नहीं, तो तुम कहते थे कि प्रलय क्या है? हम तो केवल एक अनुमान रखते हैं तथा हम विश्वास करने वाले नहीं हैं।
ये (यातना) इस कारण है कि तुमने बना लिया था अल्लाह की आयतों को उपहास तथा धोखे में रखा तुम्हें सांसारिक जीवन ने। तो आज वे नहीं निकाले जायेंगे (यातना से) और न उन्हें क्षमा माँगने का अवसर दिया जायेगा।