हमने नहीं उत्पन्न किया है आकाशों तथा धरती को और जो कुछ उनके बीच है, परन्तु सत्य के साथ, एक निश्चित अवधि तक के लिए तथा जो काफ़िर हैं, उन्हें जिस बात से सावधान किया जाता है, वे उससे मुँह मोड़े हुए हैं।
आप कहें कि भला देखो कि जिसे तुम पुकारते हो अल्लाह के सिवा, तनिक मुझे दिखा दो कि उन्होंने क्या उत्पन्न किया है धरती में से? अथवा उनका कोई साझा है आकाशों में? मेरे पास कोई पुस्तक[1] प्रस्तुत करो इससे पूर्व की अथवा बचा हुआ कुछ[2] ज्ञान, यदि तुम सच्चे हो।
तथा उससे अधिक बहका हुआ कौन हो सकता है, जो अल्लाह के सिवा उसे पुकारता हो, जो उसकी प्रार्थना स्वीकार न कर सके, प्रलय तक और वे उसकी प्रार्थना से निश्चेत (अनजान्) हों
क्या वे कहते हैं कि आपने इसे[1] स्वयं बना लिया है? आप कह दें कि यदि मैंने इसे स्वयं बना लिया है, तो तुम मुझे अल्लाह की पकड़ से बचाने का कोई अधिकार नहीं रखते।[2] वही अधिक ज्ञानि है उन बातों का, जो तुम बना रहे हो। वही पर्याप्त है गवाह के लिए मेरे तथा तुम्हारे बीच और वह बड़ा क्षमाशील, दयावान् है।
आप कह दें कि मैं कोई नया रसूल नहीं हूँ और न मैं जानता हूँ कि मेरे साथ क्या होगा[1] और न तुम्हारे साथ। मैं तो केवल अनुसरण कर रहा हूँ उसका, जो मेरी ओर वह़्यी (प्रकाशना) की जा रही है। मैं तो केवल खुला सावधान करने वाला हूँ।
आप कह दें: तुम बताओ यदि ये (क़ुर्आन) अल्लाह की ओर से हो और तुम उसे न मानो, जबकि गवाही दे चुका है एक गवाह, इस्राईल की संतान में से इसी बात[1] पर, फिर वह ईमान लाया तथा तुम घमंड कर गये? तो वास्तव में अल्लाह सुपथ नहीं दिखाता अत्याचारी जाति को।
और काफ़िरों ने कहा, उनसे जो ईमान लाये, यदि ये (धर्म) उत्तम होता, तो वह पहले नहीं आते हमसे, उसकी ओर और जब नहीं पाया मार्गदर्शन उन्होंने इस (क़ुर्आन) से, तो अब यही कहेंगे कि ये तो पुराना झूठ है।
जबकि इससे पूर्व मूसा की पुस्तक मार्गदर्शक तथा दया बनकर आ चुकी और ये पुस्तक (क़ुर्आन) सच[1] बताने वाली है अरबी भाषा में।[2] ताकि वह सावधान कर दे, अत्याचारियों को और शुभ सूचना हो, सदाचारियों के लिए।
और हमने निर्देश दिया है मनुष्य को, अपने माता-पिता के साथ उपकार करने का। उसे गर्भ में रखा है उसकी माँ ने दुःख झेलकर तथा जन्म दिया उसे दुःख झेलकर तथा उसके गर्भ में रखने तथा दूध छुड़ाने की अवधि तीस महीने रही।[1] यहाँ तक कि जब वह अपनी पूरी शक्ति को पहुँचा और चालीस वर्ष का हुआ, तो कहने लागाः हे मेरे पालनहार! मुझे क्षमता दे कि कृतज्ञ रहूँ तेरे उस पुरस्कार का, जो तूने प्रदान किया है मुझे तथा मेरे माता-पिता को। तथा ऐसा सत्कर्म करूँ, जिससे तू प्रसन्न हो जाये तथा सुधार दे मेरे लिए मेरी संतान को, मैं ध्यानमग्न हो गया तेरी ओर तथा मैं निश्चय मुस्लिमों में से हूँ।
वही हैं, स्वीकार कर लेंगे हम जिनसे, उनके सर्वोत्तम कर्मों को तथा क्षमा कर देंगे, उनके दुष्कर्मों को। (वे) स्वर्ग वासियों में से हैं, उस सत्य वचन के अनुसार, जो उनसे किया जाता था।
तथा जिसने कहा अपने माता पिता सेः धिक है तुम दोनों पर! क्या मुझे डरा रहे हो कि मैं धरती से निकाला[1] जाऊँगा, जबकि बहुत-से युग बीत गये[2] इससे पूर्व? और वो दोनों दुहाई दे रहे थे अल्लाह कीः तेरा विनाश हो! तू ईमान ला! निश्चय अल्लाह का वचन सच है। तो वह कह रहा था कि ये अगलों की कहानियाँ हैं।
यही वो लोग हैं, जिनपर अल्लाह की यातना का वचन सिध्द हो गया, उन समुदायों में, जो गुज़र चुके इनसे पूर्व, जिन्न तथा मनुष्यों में से। वास्तव में, वही क्षति में हैं।
और जिस दिन सामने लाये जायेंगे, जो काफ़िर हो गये, अग्नि के। (उनसे कहा जायेगाः) तुम ले चुके अपना आन्नद अपने सांसारिक जीवन में और लाभान्वित हो चुके उनसे। तो आज तुम्हें अपमान की यातना दी जायेगी उसके बदले, जो तुम घमंड करते रहे धरती में अनुचित तथा उसके बदले, जो उल्लंघन करते रहे।
तथा याद करो आद के भाई (हूद[1]) को। जब उसने अपनी जाति को सावधान किया, अह़्क़ाफ़[2] में, जबकि गुज़र चुके सावधान करने वाले (रसूल) उसके पहले और उसके पश्चात् कि इबादत (वंदना) न करो अल्लाह के अतिरिक्त की। मैं डरता हूँ तुमपर, एक बड़े दिन की यातना से।
हूद ने कहाः उसका ज्ञान तो अल्लाह ही को है और मैं तुम्हें वही उपदेश पहुँचा रहा हूँ, जिसके साथ मैं भेजा गया हूँ। परन्तु, मैं देख रहा हूँ तुम्हें कि तुम अज्ञानता की बातें कर रहे हो।
फिर जब उन्होंने देखा एक बादल आते हुए अपनी वादियों की ओर, तो कहाः ये एक बादल है हमपर बरसने वाला। बल्कि ये वही है, जिसकी तुमने जल्दी मचायी है। ये आँधी है, जिसमें दुःखदायी यातना है।
वह विनाश कर देगी प्रत्येक वस्तु को अपने पालनहार के आदेश से, तो वे हो गये ऐसे कि नहीं दिखाई देता था कुछ, उनके घरों के अतिरिक्त। इसी प्रकार, हम बदला दिया करते हैं अपराधी लोगों को।
तथा हमने उन्हें वह शक्ति दी थी, जो इन्हें[1] नहीं दी है। हमने बनाये थे उनके कान, आँखें और दिल, तो नहीं काम आये उनके कान, उनकी आँखें तथा न उनके दिल कुछ भी। क्योंकि वे इन्कार करते थे अल्लाह की आयतों का तथा घेर लिया उन्हें उसने, जिसका वे उपहास कर रहे थे।
तो क्यों नहीं सहायता की उनकी, उन्होंने जिन्हें बनाया था अल्लाह के अतिरिक्त (अल्लाह के) सामीप्य के लिए पूज्य (उपास्य)? बल्कि वे खो गये उनस और ये[1] उनका झूठ था तथा जिसे स्वयं वे घड़ रहे थे।
तथा याद करें, जब हमने फेर दिया आपकी ओर जिन्नों के एक[1] गिरोह को, ताकि वे क़ुर्आन सुनें। तो जब वे उपस्थित हुए आपके पास, तो उन्होंने कहा कि चुप रहो और जब पढ़ लिया गया, तो वे फिर गये अपनी जाति की ओर सावधान करने वाले होकर।
उन्होंने कहाः हे हमारी जाति! हमने सूनी है एक पुस्तक, जो उतारी गयी है मुसा के पश्चात्। वह अपने से पूर्व की किताबों की पुष्टि करती है और सत्य तथा सीधी राह दिखाती है।
हे हमारी जाति! मान लो अल्लाह की ओर बुलाने वाले की बात तथा ईमान लाओ उसपर, वह क्षमा कर देगा तुम्हारे लिए तुम्हारे पापों को तथा बचा लेगा तुम्हें दुःखदायी यातना से।
तथा जो मानेगा नहीं अल्लाह की ओर बुलाने वाले की बात, तो नहीं है वह विवश करने वाला धरती में और नहीं है उसके लिए अल्लाह के अतिरिक्त कोई सहायक। यही लोग खुले कुपथ में हैं।
और क्या उन लोगों ने नहीं समझा कि अल्लाह, जिसने उत्पन्न किया है आकाशों तथा धरती को और नहीं थका उनको बनाने से, वह सामर्थ्वान है कि जीवीत कर दे मुर्दों को? क्यों नहीं? वास्तव में, वह जो चाहे, कर सकता है।
और जिस दिन सामने लाये जायेंगे, जो काफ़िर हो गये, नरक के, (और उनसे कहा जायेगाः) क्या ये सच नहीं है? वे कहेंगे: क्यों नहीं? हमारे पालनहार की शपथ! वह कहेगाः तब चखो यातना, उस कुफ़्र के बदले, जो तुम कर रहे थे।
तो (हे नबी!) आप सहन करें, जैसे साहसी रसूलों ने सहन किया तथा जल्दी न करें उन (की यातना) के लिए। जिस दिन वे देख लेंगे, जिसका उन्हें वचन दिया जा रहा है, तो समझेंगे कि जैसे वे नहीं रहे हैं, परन्तु दिन के कुछ[1] क्षण। बात पूहुँचा दी गयी है, तो अब उन्हीं का विनाश होगा, जो अवज्ञाकारी हैं।