जब आते हैं आपके पास मुनाफ़िक़, तो कहते हैं कि हम साक्ष्य (गवाही) देते हैं कि वास्तव में आप अल्लाह के रसूल हैं तथा अल्लाह जानता है कि वास्तव में आप अल्लाह के रसूल हैं और अल्लाह गवाही देता है कि मुनाफ़िक़ निश्चय झूठे[1] हैं।
और यदि आप उन्हें देखें, तो आपको भा जायें उनके शरीर और यदि वे बात करें, तो आप सुनने लगें उनकी बात, जैसे कि वे लकड़ियाँ हों दीवार के सहारे लगायी[1] हुईं। वे प्रत्येक कड़ी ध्वनि को अपने विरुध्द[2] समझते हैं। वही शत्रु हैं, आप उनसे सावधान रहें। अल्लाह उन्हें नाश करे, वे किधर फिरे जा रहे हैं
जब उनसे कहा जाता है कि आओ, ताकि क्षमा की प्रार्थना करें तुम्हारे लिए अल्लाह के रसूल, तो मोड़ लेते हैं अपने सिर तथा आप उन्हें देखते हैं कि वे रुक जाते हैं अभिमान (घमंड) करते हुए।
हे नबी! उनके समीप समान है कि आप क्षमा की प्रार्थना करें उनके लिए अथवा क्षमा की प्रार्थना न करें उनके लिए। कदापि नहीं क्षमा करेगा अल्लाह उन्हें। वास्तव में अल्लाह सुपथ नहीं दिखाता है अवज्ञाकारियों को।
यही वो लोग हैं, जो कहते हैं कि मत ख़र्च करो उनपर, जो अल्लाह के रसूल के पास रहते हैं, ताकि वे बिखर जायें। जबकि अल्लाह ही के अधिकार में हैं आकाशों तथा धरती के सभी कोष (ख़ज़ाने)। परन्तु मुनाफ़िक़ समझते नहीं हैं।
वे कहते हैं कि यदि हम वापस पहुँच गये मदीना तक, तो निकाल[1] देगा सम्मानित उससे अपमानित को। जबकि अल्लाह ही के लिए सम्मान हैं एवं उसके रसूल तथा ईमान वालों के लिए। परन्तु मुनाफ़िक़ जानते नहीं।
तथा दान करो उसमें से, जो प्रदान किया है हमने तुम्हें, इससे पूर्व कि आ जाये तुममें से किसी के मरण का[1] समय, तो कहे कि मेरे पालनहार! क्यों नहीं अवसर दे दिया मुझे कुछ समय का। ताकि मैं दान करता तथा सदाचारियों में हो जाता।