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    Hindi - Chapter 86

    Translation by Maulana Azizul Haque Al Umari

    Verse 1

    शपथ है आकाश तथा रात में "प्रकाश प्रदान करने वाले" की

    Verse 2

    और तुम क्या जानो कि वह "रात में प्रकाश प्रदान करने वाला" क्या है

    Verse 3

    वह ज्योतिमय सितारा है।

    Verse 4

    प्रत्येक प्राणी पर एक रक्षक है।

    Verse 5

    इन्सान, ये तो विचार करे कि वह किस चीज़ से पैदा किया गया है

    Verse 6

    उछलते पानी (वीर्य) से पैदा किया गया है।

    Verse 7

    जो पीठ तथा सीने के पंजरों के मध्स से निकलता है।

    Verse 8

    निश्चय वह, उसे लौटाने की शक्ति रखता है।

    Verse 9

    जिस दिन मन के भेद परखे जायेंगे।

    Verse 10

    तो उसे न कोई बल होगा और न उसका कोई सहायक।

    Verse 11

    शपथ है आकाश की, जो बरसता है

    Verse 12

    तथा फटने वाली धरती की।

    Verse 13

    वास्तव में, ये (क़ुर्आन) दो-टूक निर्णय (फ़ैसला) करने वाला है।

    Verse 14

    हँसी की बात नहीं।

    Verse 15

    वह चाल बाज़ी करते हैं।

    Verse 16

    मैं भी चाल बाज़ी कर रहा हूँ।

    Verse 17

    अतः, काफ़िरों को कुछ थोड़ा अवसर दे दो।