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    Hindi - Chapter 97

    Translation by Maulana Azizul Haque Al Umari

    Verse 1

    निःसंदेह, हमने उस (क़ुर्आन) को 'लैलतुल क़द्र' (सम्मानित रात्रि) में उतारा।

    Verse 2

    और तुम क्या जानो कि वह 'लैलतुल क़द्र' (सम्मानित रात्रि) क्या है

    Verse 3

    लैलतुल क़द्र (सम्मानित रात्रि) हज़ार मास से उत्तम है।

    Verse 4

    उसमें (हर काम को पूर्ण करने के लिए) फ़रिश्ते तथा रूह़ (जिब्रील) अपने पालनहार की आज्ञा से उतरते हैं।

    Verse 5

    वह शान्ति की रात्रि है, जो भोर होने तक रहती है।