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Hindi - Chapter 33 - Al-Ahzab

Translation by Maulana Azizul Haque Al Umari — Permalink

Verse 1 — Surah Al-Ahzab 33:1

हे नबी! अल्लाह से डरो और काफ़िरों और मुनाफ़िक़ों की आज्ञापालन न करो। वास्तव में, अल्लाह ह़िक्मत वाला, सब कुछ जानने[1] वाला है।

Verse 2 — Surah Al-Ahzab 33:2

तथा पालन करो उसका, जो वह़्यी (प्रकाशना) की जा रही है आपकी ओर आपके पालनहार की ओर से। निश्चय अल्लाह जो तुम कर रहे हो, उससे सूचित है।

Verse 3 — Surah Al-Ahzab 33:3

और आप भरोसा करें अल्लाह पर तथा अल्लाह प्रयाप्त है, रक्षा करने वाला।

Verse 4 — Surah Al-Ahzab 33:4

और नहीं रखे हैं अल्लाह ने किसी को, दो दिल, उसके भीतर और नहीं बनाया है तुम्हारी पत्नियों को, जिनसे तुम ज़िहार[1] करते हो, उनमें से, तुम्हारी मातायें तथा नहीं बनाया है तुम्हारे मुँह बोले पुत्रों को तुम्हारा पुत्र। ये तुम्हारी मौखिक बाते हैं और अल्लाह सच कहता है तथा वही सुपथ दिखाता है।

Verse 5 — Surah Al-Ahzab 33:5

उन्हें पुकारो, उनके बापों से संबन्धित करके, ये अधिक न्याय की बात है अल्लाह के समीप और यदि तुम नहीं जानते उनके बापों को, तो वे तुम्हारे धर्म बन्धु तथा मित्र हैं और तुम्हारे ऊपर कोई दोष नहीं है उसमें, जो तुमसे चूक हुई है, परन्तु (उसमें है) जिसका निश्चय तुम्हारे दिल करें तथा अल्लाह अति क्षमाशील, दयावान् है।

Verse 6 — Surah Al-Ahzab 33:6

नबी[1] अधिक समीप (प्रिय) है ईमान वालों से, उनके प्राणों से और आपकी पत्नियाँ[2] उनकी मातायें हैं और समीपवर्ती संबन्धी एक-दूसरे से अधिक समीप[3] हैं, अल्लाह के लेख में ईमान वालों और मुहाजिरों से। परन्तु, ये कि करते रहो अपने मित्रों के साथ भलाई और ये पुस्तक में लिखा हूआ है।

Verse 7 — Surah Al-Ahzab 33:7

तथा (याद करो) जब हमने नबियों से उनका वचन[1] लिया तथा आपसे और नूह़, इब्रीम, मूसा, मर्यम के पुत्र ईसा से और हमने लिया उनसे दृढ़ वचन।

Verse 8 — Surah Al-Ahzab 33:8

ताकि वह प्रश्न[1] करे सचों से उनके सच के संबन्ध में तथा तैयार की है काफ़िरों के लिए दुःखदायी यातना।

Verse 9 — Surah Al-Ahzab 33:9

हे ईमान वालो! याद करो अल्लाह के पुरस्कार को अपने ऊपर, जब आ गये तुम्हारे पास जत्थे, तो भेजी हमने उनपर आँधी और ऐसी सेनायें जिन्हें तुमने नहीं देखा और अल्लाह जो तुम कर रहे थे, उसे देख रहा था।

Verse 10 — Surah Al-Ahzab 33:10

जब वे तुम्हारे पास आ गये, तुम्हारे ऊपर से तथा तुम्हारे नहीचे से और जब पथरा गयीं आँखें तथा आने लगे दिल मुँह[1] को तथा तुम विचारने लगे अल्लाह के संबन्ध में विभिन्न विचार।

Verse 11 — Surah Al-Ahzab 33:11

यहीं परीक्षा ली गयी ईमान वालों की और वे झंझोड़ दिये गये पूर्ण रूप से।

Verse 12 — Surah Al-Ahzab 33:12

और जब कहने लगे मुश्रिक़ और जिनके दिलों में कुछ रोग था कि अल्लाह तथा उसके रसूल ने नहीं वचन दिया हमें, परन्तु धोखे का।

Verse 13 — Surah Al-Ahzab 33:13

और जब कहा उनके एक गिरोह नेः हे यस्रिब[1] वालो! कोई स्थान नहीं तुम्हारे लिए, अतः, लौट[2] चलो तथा अनुमति माँगने लगा उनमें से एक गिरोह नबी से, कहने लगाः हमारे घर खाली हैं, जबकि वह खाली न थे। वे तो बस निश्चय कर रहे थे भाग जाने का।

Verse 14 — Surah Al-Ahzab 33:14

और यदि प्रवेश कर जातीं उनपर मदीने के चारों ओर से (सेनायें), फिर उनसे माँग की जाती उपद्रव[1] की, तो अवश्य उपद्रव कर देते और उसमें तनिक भी देर नहीं करते।

Verse 15 — Surah Al-Ahzab 33:15

जबकि उन्होंने वचन दिया था अल्लाह को इससे पूर्व कि पीछा नहीं दिखायेंगे और अल्लाह के वचन का प्रश्न अवश्य किया जायेगा।

Verse 16 — Surah Al-Ahzab 33:16

आप कह दें: कदापि लाभ नहीं पहुँचायेगा तुम्हें भागना, यदि तुम भाग जाओ मरण से और तब तुम थोड़ा ही[1] लाभ प्राप्त कर सकोगे।

Verse 17 — Surah Al-Ahzab 33:17

आप पूछिये कि वह कौन है, जो तुम्हें बचा सके अल्लाह से, यदि वह तुम्हारे साथ बुराई चाहे अथवा तुम्हारे साथ भलाई चाहे? और वह अपने लिए नहीं पायेंगे अल्लाह के सिवा कोई संरक्षक और न कोई सहायक।

Verse 18 — Surah Al-Ahzab 33:18

जानता है अल्लाह उन्हें, जो रोकने वाले हैं तुममें से तथा कहने वाले हैं अपने भाईयों से कि हमारे पास चले आओ तथा नहीं आते हैं युध्द में, परन्तु कभी-कभी।

Verse 19 — Surah Al-Ahzab 33:19

वह बड़े कंजूस हैं तुमपर। फिर जब आ जाये भय का[1] समय, तो आप उन्हें देखेंगे कि आपकी ओर तक रहे हैं, फिर रही हैं उनकी आँखें, उसके समान, जो मरणासन्न दशा में हो और जब दूर हो जाये भय, तो वह मिलेंगे तुमसे तेज़ ज़ुबानों[2] से, बड़े लोभी होकर धन के। वे ईमान नहीं लाये हैं। अतः, व्यर्थ कर दिये अल्लाह ने उनके सभी कर्म तथा ये अल्लाह पर अति सरल है।

Verse 20 — Surah Al-Ahzab 33:20

वे समझते हैं कि जत्थे नहीं[1] गये और यदि आ जायें सेनायें, तो वे चाहेंगे कि वे गाँव में हों, गाँव वालों के बीच तथा पूछते रहें तुम्हारे समाचार और यदि तुममें होते भी, तो वे युध्द में कम ही भाग लेते।

Verse 21 — Surah Al-Ahzab 33:21

तुम्हारे लिए अल्लाह के रसूल में उत्तम[1] आदर्श है, उसके लिए, जो आशा रखता हो अल्लाह और अन्तिम दिन (प्रलय) की तथा याद करो अल्लाह को अत्यधिक।

Verse 22 — Surah Al-Ahzab 33:22

और जब ईमान वालों ने सेनायें देखीं, तो कहाः यही है, जिसका वचन दिया था हमें अल्लाह और उसके रसूल ने और सच कहा अल्लाह और उसके रसूल ने और इसने अधिक नहीं किया, परन्तु (उनके) ईमान तथा स्वीकार को।

Verse 23 — Surah Al-Ahzab 33:23

ईमान वालों में कुछ वे भी हैं, जिन्होंने सच कर दिखाया अल्लाह से किये हुए अपने वचन को। तो उनमें कुछ ने अपना वचन[1] पूरा कर दिया और उनमें से कुछ प्रतीक्षा कर रहे हैं और उन्होंने तनिक भी परिवर्तन नहीं किया।

Verse 24 — Surah Al-Ahzab 33:24

ताकि अल्लाह प्रतिफल प्रदान करे सचों को उनके सच का तथा यातना दे मुनाफ़िक़ों को अथवा उन्हें क्षमा कर दे। वास्तव में, अल्लाह अति क्षमाशील और दयावान् है।

Verse 25 — Surah Al-Ahzab 33:25

तथा फेर दिया अल्लाह ने काफ़िरों को (मदीना से) उनके क्रोध के साथ। वे नहीं प्राप्त कर सके कोई भलाई और पर्याप्त हो गया अल्लाह ईमान वालों के लिए युध्द में और अल्लाह अति शक्तिशाली तथा प्रभुत्वशाली है।

Verse 26 — Surah Al-Ahzab 33:26

और उतार दिया अल्लाह ने उन अह्ले किताब को, जिन्होंने सहायता की उन (सेनाओं) की, उनके दुर्गों से तथा डाल दिया उनके दिलों में भय।[1] उनके एक गिरोह को तुम वध कर रहे थे तथा बंदी बना रहे थे एक-दूसरे गिरोह को।

Verse 27 — Surah Al-Ahzab 33:27

और तुम्हारे अधिकार में दे दी उनकी भूमि तथा उनके घरों और धनों को और ऐसी धरती को, जिसपर तुमने पग नहीं रखे थे तथा अल्लाह जो चाहे, कर सकता है।

Verse 28 — Surah Al-Ahzab 33:28

हे नबी! आप अपनी पत्नियों से कह दो कि यदि तुम चाहती हो सांसारिक जीवन तथा उसकी शोभा, तो आओ, मैं तुम्हें कुछ दे दूँ तथा विदा कर दूँ, अच्छाई के साथ।

Verse 29 — Surah Al-Ahzab 33:29

और यदि तुम चाहती हो अल्लाह और उसके रसूल तथा आख़िरत के घर को, तो अल्लाह ने तैयार कर रखा है तुममें से सदाचारिणियों के लिए भारी प्रतिफल।

Verse 30 — Surah Al-Ahzab 33:30

हे नबी की पत्नियो! जो तुममें से खुला दुराचार करेगी उसके लिए दुगनी कर दी जायेगी यातना और ये अल्लाह पर अति सरल है।

Verse 31 — Surah Al-Ahzab 33:31

तथा जो मानेंगी तुममें से अल्लाह तथा उसके रसूल की बात और सदाचार करेंगी, हम उन्हें प्रदामन करेंगे उनका प्रतिफल दोहरा और हमने तैयार की है उनके लिए उत्तम जीविका।

Verse 32 — Surah Al-Ahzab 33:32

हे नबी की पत्नियो! तुम नहीं हो अन्य स्त्रियों के समान। यदि तुम अल्लाह से डरती हो, तो कोमल भाव से बात न करो कि लोभ करने लगे वे, जिनके दिल में रोग हो और सभ्य बात बोलो।

Verse 33 — Surah Al-Ahzab 33:33

और रहो अपने घरों में और सौन्दर्य का प्रदर्शन न करो, प्रथम अज्ञान युग के प्रदर्शन के समान तथा नमाज़ की स्थापना करो, ज़कात दो तथा आज्ञा पालन करो अल्लाह और उसके रसूल की। अल्लाह चाहता है कि मलिनता को दूर कर दे तुमसे, हे नबी की घर वालियो! तथा तुम्हें पवित्र कर दे,, अति पवित्र।

Verse 34 — Surah Al-Ahzab 33:34

तथा याद रखो उसे, जो पढ़ी जाती है तुम्हारे घरों में, अल्लाह की आयतों तथा हिक्मत में से।[1] वास्तव में अल्लाह सूक्ष्मदर्शी, सर्व सूचित है।

Verse 35 — Surah Al-Ahzab 33:35

निःसंदेह, मुसलमान पुरुष और मुसलमान स्त्रियाँ, ईमान वाले पुरुष और ईमान वाली स्त्रियाँ, आज्ञाकारी पुरुष और आज्ञाकारिणी स्त्रियाँ, सच्चे पुरुष तथा सच्ची स्त्रियाँ, सहनशील पुरुष और सहनशील स्त्रियाँ, विनीत पुरुष और विनीत स्त्रियाँ, दानशील पुरुष और दानशील स्त्रियाँ, रोज़ा रखने वाले पुरुष और रोज़ा रखने वाली स्त्रियाँ, अपने गुप्तांगों की रक्षा करने वाले पुरुष तथा रक्षा करने वाली स्त्रियाँ तथा अल्लाह को अत्यधिक याद करने वाले पुरुष और याद करने वाली स्त्रियाँ, तैयार कर रखा है अल्लाह ने इन्हीं के लिए क्षमा तथा महान प्रतिफल।

Verse 36 — Surah Al-Ahzab 33:36

तथा किसी ईमान वाले पुरुष और ईमान वाली स्त्री के लिए योग्य नहीं कि जब निर्णय कर दे अल्लाह तथा उसके रसूल किसी बात का, तो उनके लिए अधिकार रह जाये अपने विषय में और जो अवज्ञा करेगा अल्लाह एवं उसके रसूल की, तो वह खुले कुपथ में[1] पड़ गया।

Verse 37 — Surah Al-Ahzab 33:37

तथा (हे नबी!) आप वह समय याद करें, जब आप उससे कह रहे थे, उपकार किया अल्लाह ने जिसपर तथा आपने उपकार किया जिसपर, रोक ले अपनी पत्नी को तथा अल्लाह से डर और आप छुपा रहे थे अपने मन में जिसे, अल्लाह उजागर करने वाला[1] था तथा डर रहे थे तुम लोगों से, जबकि अल्लाह अधिक योग्य था कि उससे डरते, तो जब ज़ैद ने पूरी करली उस (स्त्री) से अपनी आवश्यक्ता, तो हमने विवाह दिया उसे आपसे, ताकि ईमान वालों पर कोई दोष न रहे, अपने मुँह बोले पुत्रों की पत्नियों कि विषय[2] में, जब वह पूरी करलें उनसे अपनी आवश्यक्ता तथा अल्लाह का आदेश पूरा होकर रहा।

Verse 38 — Surah Al-Ahzab 33:38

नहीं है नबी पर कोई तंगी उसमें जिसका आदेश दिया है अल्लाह ने उनके लिए।[1] अल्लाह का यही नियम रहा है उन नबियों में, जो हुए हैं आपसे पहले तथा अल्लाह का निश्चित किया आदेश पूरा होना ही है।

Verse 39 — Surah Al-Ahzab 33:39

जो पहुँचाते हैं अल्लाह के आदेश तथा उससे डरते हैं, वे नहीं डरते हैं किसी से, उसके सिवा और पर्याप्त है अल्लाह ह़िसाब लेने के लिए।

Verse 40 — Surah Al-Ahzab 33:40

मुह़म्मद तुम्हारे पुरुषों मेंसे किसी के पिता नहीं हैं। किन्तु, वे[1] अल्लाह के रसूल और सब नबियों में अन्तिम[2] हैं और अल्लाह प्रत्येक वस्तु का अति ज्ञानी है।

Verse 41 — Surah Al-Ahzab 33:41

हे ईमान वालो! याद करते रहो अल्लाह को, अत्यधिक।

Verse 42 — Surah Al-Ahzab 33:42

तथा पवित्रता बयान करते रहो उसकी प्रातः तथा संध्या।

Verse 43 — Surah Al-Ahzab 33:43

वही है, जो दया कर रहा है तुमपर तथा प्रार्थना कर रहे हैं (तुम्हारे लिए) उसके फ़रिश्ते। ताकि वह निकाल दे तुम्हें अंधेरों से, प्रकाश[1] की ओर तथा ईमान वालों पर अत्यंत दयावान् है।

Verse 44 — Surah Al-Ahzab 33:44

उनका स्वागत, जिस दिन उससे मिलेंगे, सलाम से होगा और उसने तैयार कर रखा है उनके लिए सम्मानित प्रतिफल।

Verse 45 — Surah Al-Ahzab 33:45

हे नबी! हमने भेजा है आपको साक्षी,[1] शुभसूचक[2] और सचेतकर्ता[3] बनाकर।

Verse 46 — Surah Al-Ahzab 33:46

तथा बुलाने वाला बनाकर अल्लाह की ओर उसकी अनुमति से तथा प्रकाशित प्रदीप बनाकर।

Verse 47 — Surah Al-Ahzab 33:47

तथा आप शुभ सूचना सुना दें ईमान वालों को कि उनके लिए अल्लाह की ओर से बड़ा अनुग्रह है।

Verse 48 — Surah Al-Ahzab 33:48

तथा न बात मानें काफ़िरों और मुनाफ़िक़ों की तथा न चिन्ता करें उनके दुःख पहुँचाने की और भरोसा करें अल्लाह पर तथा पर्याप्त है अल्लाह काम बनाने के लिए।

Verse 49 — Surah Al-Ahzab 33:49

हे ईमान वालो! जब तुम विवाह करो ईमान वालियों से, फिर तलाक़ दो उन्हें, इससे पूर्व कि हाथ लगाओ उनको, तो नहीं है तुम्हारे लिए उनपर कोई इद्दत,[1] जिसकी तुम गणना करो। तो तुम उन्हें कुछ लाभ पहुँचाओ और उन्हें विदा करो भलाई के साथ।

Verse 50 — Surah Al-Ahzab 33:50

हे नबी! हमने ह़लाल (वैध) कर दिया है आपके लिए आपकी पत्नियों को, जिन्हें चुका दिया हो आपने उनका महर (विवाह उपहार) तथा जो आपके स्वामित्व में हो, उसमें से, जो प्रदान किया है अल्लाह ने आप[1] को तथा आपके चाचा की पुत्रियों, आपकी फूफी की पुत्रियों, आपके मामा की पुत्रियों तथा मौसी की पुत्रियों को, जिन्होंने हिजरत की है आपके साथ तथा किसी भी ईमान वाली नारी को, यदि वह स्वयं को दान कर दे नबी के लिए, यदि नबी चाहें कि उससे विवाह कर लें। ये विशेष है आपके लिए अन्य ईमान लालों को छोड़कर। हमें ज्ञान है उसका, जो हमने अनिवार्य किया है उनपर, उनकी पत्नियों तथा उनके स्वामित्व में आयी दासियों के सम्बंध[2] में। ताकि तुमपर कोई संकीर्णता (तंगी) न हो और अल्लाह अति क्षमी, दयावान् है।

Verse 51 — Surah Al-Ahzab 33:51

(आपको अधिकार है कि) जिसे आप चाहें, अलग रखें अपनी पत्नियों में से और अपने साथ रखें, जिसे चाहें और जिसे आप चाहें, बुला लें उनमें से, जिन्हें अलग किया है। आपपर कोई दोष नहीं है। इस प्रकार, अधिक आशा है कि उनकी आँखें शीतल हों और वे उदासीन न हों तथा प्रसन्न रहें उससे, जो आप उनसब को दें और अल्लाह जानता है जो तुम्हारे दिलों[1] में है और अल्लाह अति ज्ञानी, सहनशील[2] है।

Verse 52 — Surah Al-Ahzab 33:52

(हे नबी!) नहीं ह़लाल (वैध) हैं आपके लिए पत्नियाँ इसके पश्चात् और न ये कि आप बदलें उन्हें दूसरी पत्नियों[1] से, यद्यपि आपको भाये उनका सौन्दर्य। परन्तु, जो दासी आपके स्वामित्व में आ जाये तथा अल्लाह प्रत्येक वस्तु का पूर्ण रक्षक है।

Verse 53 — Surah Al-Ahzab 33:53

हे ईमान वालो! मत प्रवेश करो नबी के घरों में, परन्तु ये कि अनुमति दी जाये तुम्हें भोज के लिए, परन्तु, भोजन पकने की प्रतीक्षा न करते रहो। किन्तु, जब तुम बुलाये जाओ, तो प्रवेश करो, फिर जब भोजन करलो, तो निकल जाओ। लीन न रहो बातों में। वास्तव में, इससे नबी को दुःख होता है, अतः, वह तुमसे लजाते हैं और अल्लाह नहीं लजाता है सत्य[1] से तथा जबतुम नबी की पत्नियों से कुछ माँगो, तो पर्दे के पीछे से माँगो, ये अधिक पवित्रता का कारण है तुम्हारे दिलों तथा उनके दिलों के लिए और तुम्हारे लिए उचित नहीं है कि नबी को दुःख दो, न ये कि विवाह करो उनकी पत्नियों से, आपके पश्चात् कभी भी। वास्तव में, ये अल्लाह के समीप महा (पाप) है।

Verse 54 — Surah Al-Ahzab 33:54

यदि तुम कुछ बोलो अथवा उसे मन में रखो, तो अल्लाह प्रत्येक वस्तु का अत्यंत ज्ञानी है।

Verse 55 — Surah Al-Ahzab 33:55

कोई दोष नहीं है उन (स्त्रियों) पर अपने पिताओं, न अपने पुत्रों, न अपने भाईयों, न अपने भतीजों, न अपनी (मेल-जोल की) स्त्रियों और न अपने स्वामित्व (दासी तथा दास) के सामने होने में, यदि वे अल्लाह से डरती रहें। वास्तव में, अल्लाह प्रत्येक वस्तु पर साक्षी है।

Verse 56 — Surah Al-Ahzab 33:56

अल्लाह तथा उसके फ़रिश्ते दरूद[1] भेजते हैं नबी पर। हे ईमान वालो! उनपर दरूद तथा बहुत सलाम भेजो।

Verse 57 — Surah Al-Ahzab 33:57

जो लोग दुःख देते हैं अल्लाह तथा उसके रसूल को, तो अल्लाह ने उन्हें धिक्कार दिया है लोक तथा परलोक में और तैयार की है उनके लिए अपमानकारी यातना।

Verse 58 — Surah Al-Ahzab 33:58

और जो दुःख देते हैं ईमान वालों तथा ईमान वालियों को, बिना किसी दोष के, जो उन्होंने किया हो, तो उन्होंने लाद लिया आरोप तथा खुले पाप को।

Verse 59 — Surah Al-Ahzab 33:59

हे नबी! कह दो अपनी पत्नियों, अपनी पुत्रियों और ईमान वालों की स्त्रियों से कि डाल लिया करें अपने ऊपर अपनी चादरें। ये अधिक समीप है कि वे पहचान ली जायें। फिर उन्हें दुःख न दिया[1] जाये और अल्लाह अति क्षमि, दयावान् है।

Verse 60 — Surah Al-Ahzab 33:60

यदि न रुके मुनाफ़िक़[1] तथा जिनके दिलों में रोग है और मदीना में अफ़्वाह फैलाने वाले, तो हम आपको भड़का देंगे उनपर। फिर वे आपके साथ नहीं रह सकेंगे उसमें, परन्तु कुछ ही दिन।

Verse 61 — Surah Al-Ahzab 33:61

धिक्कारे हुए। वे जहाँ पाये जायें, पकड़ लिए जायेंगे तथा जान से मार दिये जायेंगे।

Verse 62 — Surah Al-Ahzab 33:62

यही अल्लाह का नियम रहा है उनमें, जो इनसे पूर्व रहे तथा आप कदापि नहीं पायेंगे अल्लाह के नियम में कोई परिवर्तन।

Verse 63 — Surah Al-Ahzab 33:63

प्रश्न करते हैं आपसे लोग[1] प्रलय विषय में। तो आप कह दें कि उसका ज्ञान तो अल्लाह ही को है। संभव है कि प्रलय समीप हो।

Verse 64 — Surah Al-Ahzab 33:64

अल्लाह ने धिक्कार दिया है काफ़िरों को और तैयार कर रखी है, उनके लिए, दहकती अग्नि।

Verse 65 — Surah Al-Ahzab 33:65

वे सदावासी होंगे उसमें। नहीं पायेंगे कोई रक्षक और न कोई सहायक।

Verse 66 — Surah Al-Ahzab 33:66

जिस दिन उलट-पलट किये जायेंगे उनके मुख अग्नि में, वे कहेंगेः हमारे लिए क्या ही अच्छा होता कि हम कहा मानते अल्लाह का तथा कहा मानते रसूल का

Verse 67 — Surah Al-Ahzab 33:67

तथा कहेंगेः हमारे पालनहार! हमने कहा माना अपने प्रमुखों एवं बड़ों का। तो उन्होंने हमें कुपथ कर दिया, सुपथ से।

Verse 68 — Surah Al-Ahzab 33:68

हमारे पालनहार! उन्हें दुगुनी यातना दे तथा उन्हें धिक्कार दे, बड़ी धिक्कार।

Verse 69 — Surah Al-Ahzab 33:69

हे ईमान वालो! न हो जाओ उनके समान जिन्होंने मूसा को दुःख दिया, तो अल्लाह ने निर्दोष कर दिया[1] उसे उनकी बनाई बातों से और वह था अल्लाह के समक्ष सम्मानित।

Verse 70 — Surah Al-Ahzab 33:70

हे ईमान वालो! अल्लाह से डरो तथा सही और सीधी बात बोलो।

Verse 71 — Surah Al-Ahzab 33:71

वह सुधार देगा तुम्हारे लिए तुम्हारे कर्मों को तथा क्षमा कर देगा तुम्हारे पापों को और जो अनुपालन करेगा अल्लाह तथा उसके रसूल का, तो उसने बड़ी सफलता प्राप्त कर ली।

Verse 72 — Surah Al-Ahzab 33:72

हमने प्रस्तुत किया अमानत[1] को आकाशों, धरती एवं पर्वतों पर, तो उनसबने इन्कार कर दिया उसका भार उठाने से तथा डर गये उससे। किन्तु, उसका भार ले लिया मनुष्य ने। वास्तव में, वह बड़ा अत्याचारी,[2] अज्ञान है।

Verse 73 — Surah Al-Ahzab 33:73

(ये अमानत का भार इसलिए लिया है) ताकि अल्लाह दण्ड दे मुनाफ़िक़ पुरुष तथा मुनाफ़िक़ स्त्रियों को और मुश्रिक पुरुष तथा स्त्रियों को तथा क्षमा कर दे अल्लाह ईमान वालों तथा ईमान वालियों को और अल्लाह अति क्षमाशील, दयावान् है।