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Hindi - Chapter 36 - Ya-Sin

Translation by Maulana Azizul Haque Al Umari — Permalink

Verse 1 — Surah Ya-Sin 36:1

Verse 2 — Surah Ya-Sin 36:2

शपथ है सुदृढ़ क़ुर्आन की

Verse 3 — Surah Ya-Sin 36:3

वस्तुतः, आप रसूलों में से हैं।

Verse 4 — Surah Ya-Sin 36:4

सुपथ पर हैं।

Verse 5 — Surah Ya-Sin 36:5

(ये क़ुर्आन) प्रभुत्वशाली, अति दयावान् का अवतरित किया हुआ है।

Verse 6 — Surah Ya-Sin 36:6

ताकि आप सावधान करें उस जाति[1] को, नहीं सावधान किये गये हैं जिनके पूर्वज। इस लिए वे अचेत हैं।

Verse 7 — Surah Ya-Sin 36:7

सिध्द हो चुका है वचन[1] उनमें से अधिक्तर लोगों पर। अतः, वे ईमान नहीं लायेंगे।

Verse 8 — Surah Ya-Sin 36:8

तथा हमने डाल दिये हैं तौक़ उनके गलों में, जो हड्डियों तक[1] हैं। इसलिए वे सिर ऊपर किये हुए हैं।

Verse 9 — Surah Ya-Sin 36:9

तथा हमने बना दी है उनके आगे एक आड़ और उनके पीछे एक आड़। फिर ढाँक दिया है उनको, तो[1] वे देख नहीं रहे हैं।

Verse 10 — Surah Ya-Sin 36:10

तथा समान है उनपर कि आप उन्हें सावधान करें अथवा सावधान न करें, वे ईमान नहीं लायेंगे।

Verse 11 — Surah Ya-Sin 36:11

आप तो बस उसे सचेत कर सकेंगे, जो माने इस शिक्षा (क़ुर्आन) को तथा डरे अत्यंत कृपाशील से, बिन देखे। तो आप शुभ सूचना सुना दें उसे, क्षमा की तथा सम्मानित प्रतिफल की।

Verse 12 — Surah Ya-Sin 36:12

निश्चय हम ही जीवित करेंगे मुर्दों को तथा लिख रहे हैं, जो कर्म उन्होंने किया है और उनके पद् चिन्हों[1] को तथा प्रत्येक वस्तु को हमने गिन रखा है, खुली पुस्तक में।

Verse 13 — Surah Ya-Sin 36:13

तथा आप उन्हें[1] एक उदाहरण दीजिये नगर वासियों का। जब आये उसमें कई रसूल।

Verse 14 — Surah Ya-Sin 36:14

जब हमने भेजा उनकी ओर दो को। तो उन्होंने झुठला दिया उन दोनों को। फिर हमने समर्थन दिया तीसरे के द्वारा। तो तीनों ने कहाः हम तुम्हारी ओर भेजे गये हैं।

Verse 15 — Surah Ya-Sin 36:15

उन्होंने कहाः तुम सब तो मनुष्य ही हो, हमारे[1] समान और नहीं अवतरित किया है अत्यंत कृपाशील ने कुछ भी। तुम सब तो बस झूठ बोल रहे हो।

Verse 16 — Surah Ya-Sin 36:16

उन रसूलों ने कहाः हमारा पालनहार जानता है कि वास्तव में हम तुम्हारी ओर रसूल बनाकर भेजे गये हैं।

Verse 17 — Surah Ya-Sin 36:17

तथा हमारा दायित्व नहीं है खुला उपदेश पहुँचा देने के सिवा।

Verse 18 — Surah Ya-Sin 36:18

उन्होंने कहाः हम तुम्हें अशुभ समझ रहे हैं। यदि तुम रुके नहीं, तो हम तुम्हें अवश्य पथराव करके मार डालेंगे और तुम्हें अवश्य हमारी ओर से पहुँचेगी दुःखदायी यातना।

Verse 19 — Surah Ya-Sin 36:19

उन्होंने कहाः तुम्हारा अशुभ तुम्हारे साथ है। क्या यदि तुम्हें शिक्षा दी जाये (तो अशुभ समझते हो)? बल्कि तुम उल्लंघनकारी जाति हो।

Verse 20 — Surah Ya-Sin 36:20

तथा आया नगर के अन्ति किनारे से, एक पुरुष दौड़ता हुआ। उसने कहाः हे मेरी जाति के लोगो! अनुसरण करो रसूलों का।

Verse 21 — Surah Ya-Sin 36:21

अनुसरण करो उनका, जो तुमसे नहीं माँगते कोई पारिश्रमिक (बदला) तथा वे सुपथ पर हैं।

Verse 22 — Surah Ya-Sin 36:22

तथा मुझे क्या हुआ है कि मैं उसकी इबादत (वंदना) न करूँ, जिसने मुझे पैदा किया है? और तुमसब उसी की ओर फेरे जाओगे।

Verse 23 — Surah Ya-Sin 36:23

क्या मैं बना लूँ उसे छोड़कर बहुत-से पूज्य? यदि अत्यंत कृपाशील मुझे कोई हानि पहुँचाना चाहे, तो नहीं लाभ पहूँचायेगी मुझे उनकी अनुशंसा (सिफ़ारिश) कुछ और न वे मुझे बचा सकेंगे।

Verse 24 — Surah Ya-Sin 36:24

वास्तव में, तब तो मैं खुले कुपथ में हूँ।

Verse 25 — Surah Ya-Sin 36:25

निश्चय, मैं ईमान लाया तुम्हारे पालनहार पर, अतः, मेरी सुनो।

Verse 26 — Surah Ya-Sin 36:26

(उससे) कहा गयाः तुम प्रवेश कर जाओ स्वर्ग में। उसने कहाः काश मेरी जाति जानती

Verse 27 — Surah Ya-Sin 36:27

जिसकारण क्षमा[1] कर दिया मुझे मेरे पालनहार ने और मुझे सम्मिलित कर दिया सम्मानितों में।

Verse 28 — Surah Ya-Sin 36:28

तथा हमने नहीं उतारी उसकी जाति पर उसके पश्चात् कोई सेना[1] आकाश से और न हमें उतारने की आवश्यक्ता थी।

Verse 29 — Surah Ya-Sin 36:29

वह तो बस एक कड़ी ध्वनि थी। फिर सहसा सबके सब बुझ गये।

Verse 30 — Surah Ya-Sin 36:30

हाय संताप है[1] भक्तों पर! नहीं आया उनके पास रसूल, परन्तु वे उसका उपहास करते रहे।

Verse 31 — Surah Ya-Sin 36:31

क्या उन्होंने नहीं देखा कि उनसे पहले विनाश कर दिया बहुत-से समुदायों का। वे उनकी ओर दोबारा फिरकर नहीं आयेंगे।

Verse 32 — Surah Ya-Sin 36:32

तथा सबके सब हमारे समक्ष उपस्थित किये[1] जायेंगे।

Verse 33 — Surah Ya-Sin 36:33

तथा उन[1] के लिए एक निशानी है निर्जीव (सूखी) धरती। जिसे हमने जीवित कर दिया और हमने निकाले उससे अन्न, तो तुम उसीमें से खाते हो।

Verse 34 — Surah Ya-Sin 36:34

तथा पैदा कर दिये उसमें बाग़ खजूरों तथा अंगूरों के और फाड़ दिये उसमें जल स्रोत।

Verse 35 — Surah Ya-Sin 36:35

ताकि वे खायें उसके फल और नहीं बनाया है उसे उनके हाथों ने। तो क्या वे कृतज्ञ नहीं होते

Verse 36 — Surah Ya-Sin 36:36

पवित्र है वह, जिसने पैदा किये प्रत्येक जोड़े, उसके जिसे उगाती है धरती तथा स्वयं उनकी अपनी जाति के और उसके, जिसे तुम नहीं जानते हो।

Verse 37 — Surah Ya-Sin 36:37

तथा एक निशानी (चिन्ह) है उनके लिए रात्रि। खींच लेते हैं हम जिससे दिन को, तो सहसा वह अंधेरों में हो जाते हैं।

Verse 38 — Surah Ya-Sin 36:38

तथा सूर्य चला जा रहा है अपने निर्धारित स्थान की ओर। ये प्रभुत्वशाली सर्वज्ञ का निर्धारित किया हुआ है।

Verse 39 — Surah Ya-Sin 36:39

तथा चन्द्रमा के हमने निर्धारित कर दिये हैं गंतव्य स्थान। यहाँतक कि फिर वह हो जाता है पुरानी खजूर की सूखी शाखा के समान।

Verse 40 — Surah Ya-Sin 36:40

न तो सूर्य के लिए ही उचित है कि चन्द्रमा को पा जाये और न रात अग्रगामी हो सकती है दिन से। सब एक मण्डल में तैर रहे हैं।

Verse 41 — Surah Ya-Sin 36:41

तथा उनके लिए एक निशानी (लक्षण) (ये भी) है कि हमने सवार किया उनकी संतान को भरी हुई नाव में।

Verse 42 — Surah Ya-Sin 36:42

तथा हमने पैदा किया उनके लिए उसके समान वह चीज़, जिसपर वे सवार होते हैं।

Verse 43 — Surah Ya-Sin 36:43

और यदि हम चाहें, तो उन्हें जलमगन कर दें। तो न कोई सहायक होगा उनका और न वे निकाले (बचाये) जायेंगे।

Verse 44 — Surah Ya-Sin 36:44

परन्तु, हमारी दया से तथ लाभ देने के लिए एक समय तक।

Verse 45 — Surah Ya-Sin 36:45

और[1] जब उनसे कहा जाता है कि डरो उस (यातना) से, जो तुम्हारे आगे तथा तुम्हारे पीछे है, ताकि तुमपर दया की जाये।

Verse 46 — Surah Ya-Sin 36:46

तथा नहीं आती उनके पास कोई निशानी उनके पालनहार की निशानियों में से, परन्तु वे उससे मुँह फेर लेते हैं।

Verse 47 — Surah Ya-Sin 36:47

तथा जब उनसे कहा जाता है कि दान करो उसमें से, जो प्रदान किया है अल्लाह ने तुम्हें, तो कहते हैं जो काफ़िर हो गये उनसे, जो ईमान लाये हैं: क्या हम उसे खाना खिलायें, जिसे यदि अल्लाह चाहे, तो खिला सकता है? तुमतो खुले कुपथ में हो।

Verse 48 — Surah Ya-Sin 36:48

और वे कहते हैं कि कब ये (प्रलय) का वचन पूरा होगा, यदि तुम सत्यवादी हो

Verse 49 — Surah Ya-Sin 36:49

वह नहीं प्रतीक्षा कर रहे हैं, परन्तु एक कड़ी ध्वनि[1] की, जो उन्हें पकड़ लेगी और वह झगड़ रहे होंगे।

Verse 50 — Surah Ya-Sin 36:50

तो न वह कोई वसिय्यत कर सकेंगे और न अपने परिजनों में वापस आ सकेंगे।

Verse 51 — Surah Ya-Sin 36:51

तथा फूँका[1] जायेगा सूर (नरसिंघा) में, तो वह सहसा समाधियों से अपने पालनहार की ओर भागते हुए चलने लगेंगे।

Verse 52 — Surah Ya-Sin 36:52

वे कहेंगेः हाय हमारा विनाश! किसने हमें जगा दिया हमारे विश्राम गृह से? ये वो है, जिसका वचन दिया था अत्यंत कृपाशील ने तथा सच कहा था रसूलों ने।

Verse 53 — Surah Ya-Sin 36:53

नहीं होगी वह, परन्तु एक कड़ी ध्वनि। फिर सहसा वे सबके सब, हमारे समक्ष उपस्थित कर दिये जायेंगे।

Verse 54 — Surah Ya-Sin 36:54

तो आज नहीं अत्याचार किया जायेगा किसी प्राणी पर कुछ और तुम्हें उसी का प्रतिफल (बदला) दिया जायेगा, जो तुम कर रहे थे।

Verse 55 — Surah Ya-Sin 36:55

वास्तव में, स्वर्गीय आज अपने आनन्द में लगे हुए हैं।

Verse 56 — Surah Ya-Sin 36:56

वे तथा उनकी पत्नियाँ सायों में हैं, मस्नदों पर तकिये लगाये हुए।

Verse 57 — Surah Ya-Sin 36:57

उनके लिए उसमें प्रत्येक प्रकार के फल हैं तथा उनके लिए वो है, जिसकी वे माँग करें।

Verse 58 — Surah Ya-Sin 36:58

(उन्हें) सलाम कहा गया है अति दयावान् पालनहार की ओर से।

Verse 59 — Surah Ya-Sin 36:59

तथा तुम अलग[1] हो जाओ आज, हे अपराधियो

Verse 60 — Surah Ya-Sin 36:60

हे आदम की संतान! क्या मैंने तुमसे बल देकर नहीं कहा था कि इबादत (वंदना) न करना शैतान की? वास्तव में, वह तुम्हारा खुला शत्रु है।

Verse 61 — Surah Ya-Sin 36:61

तथा इबादत (वंदना) करना मेरी ही, यही सीधी डगर है।

Verse 62 — Surah Ya-Sin 36:62

तथा वह कुपथ कर चुका है, तुममें से बहुत-से समुदायों को, तो क्या तुम समझते नही हो

Verse 63 — Surah Ya-Sin 36:63

यही नरक है, जिसका वचन तुम्हें दिया जा रहा था।

Verse 64 — Surah Ya-Sin 36:64

आज, प्रवेश कर जाओ उसमें, उस कुफ़्र के बदले, जो तुम कर रहे थे।

Verse 65 — Surah Ya-Sin 36:65

आज, हम मुहर (मुद्रा) लगा देंगे उनके मुखों पर और हमसे बात करेंगे उनके हाथ तथा साक्ष्य (गवाही) देंगे उनके पैर, उनके कर्मों की, जो वे कर रहे थे।

Verse 66 — Surah Ya-Sin 36:66

और यदि हम चाहते, तो उनकी आँखें अंधी कर देते। फिर वे दौड़ते संगार्ग की ओर, परन्तु कहाँ से देखते

Verse 67 — Surah Ya-Sin 36:67

और यदि हम चाहते, तो विकृत कर देते उन्हें, उनके स्थान पर, तो न वे आगे जा सकते थे, न पीछे फिर सकते थे।

Verse 68 — Surah Ya-Sin 36:68

तथा जिसे हम अधिक आयु देते हैं, उसे उत्पत्ति में, प्रथम दशा[1] की ओर फेर देते हैं। तो क्या वे समझते नहीं हैं

Verse 69 — Surah Ya-Sin 36:69

और हमने नहीं सिखाया नबी को काव्य[1] और न ये उनके लिए योग्य है। ये तो मात्र, एक शिक्षा तथा खुला क़ुर्आन है।

Verse 70 — Surah Ya-Sin 36:70

ताकि वो सचेत करें, उसे जो जीवित हो[1] तथा सिध्द हो जाये यातना की बात, काफ़िरों पर।

Verse 71 — Surah Ya-Sin 36:71

क्या मनुष्य ने नहीं देखा कि हमने पैदा किये हैं उनके लिए उसमें से, जिसे बनाया है हमारे हाथों ने चौपाये। तो वे उनके स्वामी हैं

Verse 72 — Surah Ya-Sin 36:72

तथा हमने वश में कर दिया उन्हें, उनके, तो उनमें से कुछ उनकी सवारी हैं तथा उनमें से कुछ को वे खाते हैं।

Verse 73 — Surah Ya-Sin 36:73

तथा उनके लिए उनमें बहुत-से लाभ तथा पेय हैं। तो क्या (फिर भी) वे कृतज्ञ नहीं होते

Verse 74 — Surah Ya-Sin 36:74

और उन्होंने बना लिया अल्लाह के सिवा बहुत-से पूज्य कि संभवतः, वे उनकी सहायता करेंगे।

Verse 75 — Surah Ya-Sin 36:75

वे स्वयं अपनी सहायता नहीं कर सकेंगे तथा वे उनकी सेना हैं, (यातना) में[1] उपस्थित।

Verse 76 — Surah Ya-Sin 36:76

अतः, आपको उदासीन न करे उनकी बात। वस्तुतः, हम जानते हैं, जो वे मन में रखते हैं तथा जो बोलते हैं।

Verse 77 — Surah Ya-Sin 36:77

और क्या नहीं देखा मनुष्य ने कि पैदा किया हमने उसे वीर्य से? फिर भी वह खुला झगड़ालू है।

Verse 78 — Surah Ya-Sin 36:78

और उसने वर्णन किया हमारे लिए एक उदाहरण, और अपनी उत्पत्ति को भूल गया। उसने कहाः कौन जीवित करेगा इन अस्थियों को, जबकि वे जीर्न हो चुकी होंगी

Verse 79 — Surah Ya-Sin 36:79

आप कह दें: वही, जिसने पैदा किया है प्रथम बार और वह प्रत्येक उत्पत्ति को भली-भाँति जानने वाला है।

Verse 80 — Surah Ya-Sin 36:80

जिसने बना दी तुम्हारे लिए हरे वृक्ष से अग्नि, तो तुम उससे आग[1] सुलगाते हो।

Verse 81 — Surah Ya-Sin 36:81

तथा क्या जिसने आकाशों तथा धरती को पैदा किया है वह सामर्थ्य नहीं रखता इसपर कि पैदा करे उसके समान? क्यों नहीं जबकि वह रचयिता, अति ज्ञाता है

Verse 82 — Surah Ya-Sin 36:82

उसका आदेश, जब वह किसी चीज़ को अस्तित्व प्रदान करना चाहे, तो बस ये कह देना हैः हो जा। तत्क्षण वह हो जाती है।

Verse 83 — Surah Ya-Sin 36:83

तो पवित्र है वह, जिसके हाथ में प्रत्येक वस्तु का राज्य है और तुमसब उसी की ओर फेरे[1] जाओगे।